{"product_id":"9788126704163-kisan","title":"Kisan","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Honore De Balzac\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकिसान किसान (अंग्रेजी में ‘दि पीजश्ण्ट्री’ और ‘संस ऑफ दि सॉयल’ नाम से प्रकाशित) ‘ह्यूमन कामेडी’ शृंखला के अन्तिम चरण की रचना है। इसकी गणना बाल्जशक की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और परिपक्व कृतियों में की जाती है। बाल्जशक ने ‘ह्यूमन कामेडी’ की पूरी परियोजना के अन्तर्गत, अपने चार उपन्यासों में फ्रांसीसी ग्रामीण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग को चित्रित करते हुए, सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के पूँजीवादी रूपान्तरण तथा आधुनिक पूँजीवाद के विकास में कृषि की भूमिका को, पूँजीवाद के अन्तर्गत गाँव और शहर के बीच लगातार बढ़ती खाई को, छोटे मालिक किसानों पर सूदखोर महाजनों की जकड़बन्दी को, शहरी और ग्रामीण महाजनी के फर्क को, कृषि में माल-उत्पादन के बढ़ते वर्चस्व और किसानी जीवन पर मुद्रा के आच्छादनकारी प्रभाव को तथा किसान आबादी के विभेदीकरण (डिफरेंसिएशन) और कंगालीकरण को जिस अन्तर्भेदी गहराई और चहुँमुखी व्यापकता के साथ प्रस्तुत किया है, वह आर्थिक इतिहास या समाज-विज्ञान की किसी पुस्तक में भी देखने को नहीं मिलता। बाल्जशक शहरी मध्यवर्गीय रोमानी नजरिए से न तो कहीं ‘अहा, ग्राम्य-जीवन भी क्या है’ की आहें भरते नजर आते हैं, न ही उन ‘काव्यात्मक सम्बन्धांे’ और पुरानी संस्थाओं- सम्बन्धों-चीजों के लिए बिसूरते दीखते हैं जिन्हें पूँजी या तो लील जाती है, या पुनःसंस्कारित करके अपना लेती है या फिर अजायबघरों में सुरक्षित कर देती है। इसके विपरीत वह ठहरे हुए ग्रामीण जीवन की कूपमंडूकतापूर्ण तुष्टि के प्रति वितृष्णा प्रकट करते हैं और उस मध्यवर्गीय शहरी नजरिए की खिल्ली उड़ाते हैं जिसे ग्राम्य जीवन एक खूबसूरत लैण्डस्कैप नजर आता है। एक ठण्डी वस्तुपरकता के साथ बाल्जशक गाँवों में व्याप्त पिछड़ेपन, अज्ञानता, विपन्नता, कूपमंडूकता, निर्ममता और उस अमानवीकरण की चर्चा करते हैं जो मंथर गति वाले अलग-थलग पड़े ‘स्वायत्तप्राय’ ग्रामीण परिवेश के अपरिहार्य गुण हैं और गाँवों में पूँजी का प्रवेश इन्हें और निर्मम-निरंकुश बनाने का काम ही करता है। पश्चिमी दुनिया में कृषि में पूँजीवाद का प्रवेश सबसे क्रान्तिकारी ढंग से फ्रांस और अमेरिका में हुआ। वहाँ के बूर्ज्वा जनवादी क्रान्ति के उत्तरकालीन परिदृश्य को चित्रित करते हुए बाल्जशक ने दिखलाया है कि ग्रामीण जीवन वहाँ भी लगभग ठहरा हुआ सा है, भविष्य को लेकर कहीं कोई उत्साह नहीं है, बाहरी दुनिया से नाम-मात्र का सम्पर्क है, नये विचारों का प्रभाव नगण्य है। खेतिहर मजदूर, छोटा मालिक किसान, रिटायर्ड फौजी - सभी आत्मविश्वास से रिक्त, रामभरोसे जी रहे हैं। खेतों में भरपूर हाड़ गलाने के बावजूद कुछ भी हासिल नहीं होता। गरीबी, भूमिहीनता, ऋणग्रस्तता, कुपोषण, बीमारी, गरीबी के चलते ऊँची जन्म दर और ऊँची मृत्यु दर - विशेषकर शिशु मृत्यु दर तथा अंधविश्वास और भाग्यवाद का चतुर्दिक बोलबाला है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की स्थिति के हर पहलू को तफसील से देखते हुए बाल्जशक किसान में समस्या के सारतत्त्व को पकड़ते हैं और बताते हैं कि सवाल भूस्वामित्व की सामन्ती व्यवस्था का नहीं है, बल्कि अपनेआप में भू-स्वामित्व की पूरी व्यवस्था का ही है। सामन्ती भूस्वामी की जगह पूँजीवादी फौजी जनरल या ऑपेरा गायिका के आ जाने से आम किसान की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता। किसान की खून-पसीने की कमाई के मुख्य अपहर्ता प्रायः सामने नहीं होते। वे बदलते रहते हैं, पर किसानों का रोजमर्रे के जीवन में जिन बिचौलियों से साबका पड़ता है, उनकी स्थिति अपरिवर्तित रहती है। किसान उपन्यास में बाल्जशक रिगू-गोबर्तें गठजोड़ के रूप में व्यापारी-भूस्वामी- सूदखोर गठजोड़ की किसानों पर चतुर्दिक जकड़बन्दी की तस्वीर उपस्थित करते हैं और दिखलाते हैं कि किस तरह प्रशासन, न्याय, ऋण और व्यापार के पूरे तंत्र पर इस गिरोह का ऑक्टोपसी नियंत्रण कायम है। स्वयं बाल्जशक के ही शब्दों में: ‘‘छोटे किसान की त्रासदी यह है कि सामन्ती शोषण से मुक्त होकर वह पूंजीवादी शोषण के जाल में फँस गया है।’’ ख्सम्पादकीय आलेख से ,\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910145888407,"sku":"9788126704163","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126704163.webp?v=1770876776","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9788126704163-kisan","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}