{"product_id":"9788183612371-panch-aangnon-wala-ghar","title":"Panch Aangnon Wala Ghar","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Govind Mishra\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘‘राजन को अजीब-सा लगा - मनुष्यों की तरह घर भी बीतते हैं, वे भी चलते हैं,  समय के साथ सरकते हैं...अलबत्ता धीरे-धीरे। कुछ समय बाद घर का कोई टुकड़ा  कहीं का कहीं पहुँचा दिखता है; कहीं से टूटा, कहीं जा मिला। घरों की शक्लें  बदल जाती हैं... कभी- कभी इतनी कि पहचान में नहीं आतीं। हम घरों को अपनी  हदों में घेरने बेचैन रहते हैं पर उनकी स्वाभाविक - धीमी - चाल उस दिशा की  ओर होती है जहाँ वे घेरों को तोड़, बाहर जमीन के खुले विस्तार से जा मिलें।  इसलिए हर घर धीरे-धीरे खँडहर की तरफ सरकता होता है।’’  - इसी उपन्यास से करीब पचास वर्षों में फैली पाँच आँगनों वाला घर के सरकने की कहानी दरअसल  तीन पीढ़ियों की कहानी है - एक वह जिसने 1942 के आदर्शों की साफ़्$ हवा  अपने फेफड़ों में भरी, दूसरी वह जिसने उन आदर्शों को धीरे-धीरे अपनी हथेली  से झरते देखा और तीसरी वह जो उन आदर्शों को सिर्फ पाठ्य-पुस्तकों में पढ़  सकी। परिवार कैसे उखड़कर सिमटता हुआ करीब-करीब नदारद होता जा रहा है -  व्यक्ति को उसकी वैयक्तिकता के सहारे अकेला छोड़कर! गोविन्द मिश्र के इस  सातवें उपन्यास को पढ़ना अकेले होते जा रहे आदमी की उसी पीड़ा से गुज़रना  है।      \u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910143365271,"sku":"9788183612371","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788183612371.webp?v=1770876737","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9788183612371-panch-aangnon-wala-ghar","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}