{"product_id":"9789360863333-jab-har-hansi-sandigdh-thi","title":"Jab Har Hansi Sandigdh Thi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Parag Pawan\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e ‘मैंने जिसे देश समझकर प्यार किया वह विचारों की क़त्लगाह था।’ \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e अपने आक्रोश और असहमति में पराग पावन जितने युवा हैं, अन्याय और शोषण की संरचना को समझने में उतने ही वयस्क। उनके इस पहले संग्रह में शामिल कविताओं का भावात्मक और भाषिक वैविध्य बताता है कि एक विधा के रूप में कविता को उन्होंने जितनी गम्भीरता से लिया है, वैसा कम ही युवा कवि करते हैं। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e स्मृतियों में बसी \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e ‘चूल्हे की राख’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e से आरम्भ होकर \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e ‘कथा कहूँ कवि गंग की’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e शीर्षक एक सुदीर्घ आख्यानपरक कविता तक उठनेवाला यह संग्रह उन हत्यारों की पहचान भी करता है जो कभी आपकी अस्मिता तो कभी असमर्थता पर आक्रमण कर बिना हथियार ही आपको संसार से नफ़ी कर देते हैं; और उन प्रातिभ चापलूसों को भी दिखाता है जो ‘दुखी किसी-किसी को, ख़ुश अधिकांश को करते हुए’ सब कुछ को अपने अनुकूल करने में तल्लीन हैं। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e पराग जहाँ ज़रूरी समझते हैं व्यंग्य को और जहाँ ज़रूरी समझते हैं करुणा को उसकी पूरी सम्भावना के साथ प्रयोग करते हैं। व्यक्ति और व्यवस्था, दोनों जगह निहित ख़तरों की पर्याप्त पहचान उन्हें हैं-‘गाँव 2020’ का अतियथार्थ हो या उस अध्यापक को याद करना जिसे बताना पड़ता है कि ‘प्रेम आदमी का अवैतनिक चिकित्सक है।’ \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e ‘बेरोज़गार’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e शीर्षक पराग की बहुत चर्चित कविता-शृंखला के अलावा न्यायाकांक्षी युवा चेतना के और भी आयामों को रेखांकित करने वाली कविताएँ इस संग्रह में मिलेंगी, और एक नागरिक मन की उदासी भी जिसे कोई धोखा नहीं देता, सिवा उसकी उम्मीदों के। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e साथ ही प्रेम के कंधे पर कुहनी टिकाए खड़ी उम्मीद भी यहाँ है-जहाँ शाम ख़त्म होती है\/रात वहीं से शुरू नहीं होती\/रात शुरू होती है तुम्हारे मेरा बाज़ू पकड़ने से\/और उस बेआवाज़ वाक्य से\/कि थक गए हो\/चलो, घर चलें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910155915415,"sku":"9789360863333","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360863333.webp?v=1770876837","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360863333-jab-har-hansi-sandigdh-thi","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}