{"product_id":"9789360865733-shubh-din","title":"Shubh Din","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Balram\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eकेदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा की तरह बलराम भी पत्नीमुखी प्रेम के चितेरे हैं। विपन्न से विपन्न घर में भी यदि पति या पिता संवेदनशील हो तो गृहस्थी सुखी हो सकती है। दाम्पत्य है तो एक बड़ा भाव ही, जिसमें नौ रसों का समाहार है—शृंगार से शुरू होकर यात्रा रौद्र, वीभत्स आदि के भभके संभालती हुई अंततः करुणा पर तिरोहित! ‘शुभ दिन’ पति-पत्नी की मैरिज एनिवर्सरी का दिन है! कभी बच्चा, कभी मूड, कभी थकान, किसी न किसी बहाने टलती रही दैहिक आपसदारी इस दाम्पत्य में क्षीण हो चली है, पर पति स्वयं को उस शुभ दिन भी आरोपित नहीं करता और पत्नी आँखें मूंदे इंतजार करती रहती है, पर जो टल गया है, उसका रस-बोध बहुत सघन है, जीवन में और कहानी में भी। इस मार्मिकता में यह कहानी ओ हेनरी की ‘द गिफ्ट्स ऑफ द मेजाई’ से तुलनीय लगती है। समकालीन हिन्दी कहानी में ‘शुभ दिन’ उस दिन की सरस प्रतीक्षा के रूप में पढ़ी जानी चाहिए, जब पुरुष स्त्रीचेता होगा, स्त्री की संकेत भाषा समझ पाने लायक। बलराम की तरह ही ‘शुभ दिन’ का नायक एक स्त्रीचेता नवल पुरुष है, जो स्त्री को बहस की सुविधा देता है और थककर सोई उसकी देह पर अपनी देह आरोपित नहीं करता! ऐसे ही संवेदनशील और हमदर्द पुरुष की प्रतीक्षा में आज की हर स्त्री है, जो अपनी वृत्तियों पर काबू रख सके और योग्य बनकर इंतजार कर सके कि स्त्री स्वयं उमड़कर उसका हाथ पकड़ लेगी! अपनी कहानियों में बलराम ऐसे संवेदनशील पुरुषों की कल्पना कर पाए, यह एक बड़ी बात है! इस संग्रह की सभी कहानियाँ ऐसी ही मोहक हैं। —अनामिका\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910136156311,"sku":"9789360865733","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360865733.webp?v=1770876688","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360865733-shubh-din","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}