{"product_id":"9789360866068-mujhe-pahchano","title":"Mujhe Pahchano","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Sanjeev\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘मुझे पहचानो’ परम्परा और संस्कृति को एक नई रोशनी में देखने वाला उपन्यास है। इसकी कथा एक ऐसी रियासत से शुरू होती है जिसके लिए सती जैसी नृशंस प्रथा सांस्कृतिक गौरव की हैसियत रखती है। इसके पात्र एक ऐसे समाज में साँस ले रहे हैं जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व जैसे मानवीय मूल्य आकाशकुसुम बने हुए हैं, लेकिन जिसका प्रभुवर्ग अपने कथित सांस्कृतिक गौरव को यथावत रखने के लिए शुचिता को एक अपरिहार्य आवश्यकता बनाकर थोपे हुए है। यह शुचिता है वर्ण की, वर्ग की और रक्त की। लैंगिक और यौन शुचिताएँ भी इसमें शामिल हैं। आश्चर्य नहीं कि पुरुष-वर्चस्व पर टिके इस समाज में सती-प्रथा को व्याधि नहीं, अपनी विशेषता समझा जाता है और उसका धार्मिक-सांस्कृतिक महिमामंडन किया जाता है। इस जड़ता की जड़ें इतने गहरे धँसी हैं कि अधिकतर स्त्रियाँ भी सती को श्रद्धा की निगाह से देखती हैं। यह उपन्यास इसी छद्म गौरवबोध को अनावृत करता है। पुरुष-सत्ता की चालाकियों और उससे उत्पन्न सामाजिक ठहराव को तोड़ते हुए इस उपन्यास की कथा धर्म और धन के घातक गठजोड़ को भी बहुत ठोस रूप में पाठकों के सामने रखती है। संजीव का कथा-लेखन समूचे हिन्दी कथा-संसार में विशिष्ट इसलिए है कि उनकी लेखनी अविचलित भाव से न सिर्फ समाज की कथा कहती है, बल्कि हमें एक वैज्ञानिक दृष्टि देते हुए तर्कों और तथ्यों से भी समृद्ध करती है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910164893847,"sku":"9789360866068","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360866068.webp?v=1770876934","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360866068-mujhe-pahchano","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}