{"product_id":"9789360866501-ragini","title":"Ragini","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Gopal Singh Nepali\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eनेपाली जी में साहित्य की एक प्रखर प्यास है, जिसके बुझने पर साहित्य का कल्याण निर्भर है। —सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ वह तो मैं हूँ, जो हँसता हूँ\/मस्ती है, कुछ गाता हूँ जो रोते हैं उन्हें मनाकर\/अपना गीत सुनाता हूँ सन् 1935 में पहली बार प्रकाशित नेपाली जी का ‘रागिनी’ काव्य-संग्रह जीवन और संसार के विभिन्न पक्षों को सम्बोधित कविताओं का संकलन है। यह काव्य का सहज प्रवाह है, जिसे कवि अबाध, हर क्षण न केवल अपने भीतर बहने देता है, बल्कि कविता के अनुशासन में रचकर उसे हमारे पास तक भी पहुँचाता है। ‘वंदगी’ शीर्षक कविता में अपने अन्तस के कृतज्ञता भाव को चर-अचर जगत को समर्पित करते हुए जब वे कहते हैं : वंदे तरु के पीले पत्ते, जिनमें कुछ रस-धार न हो; वैसे यहाँ न हों प्रेमी, तो सच कह दूँ संसार न हो तो कविता जैसे अपनी सर्वांग चिन्ता के साथ हमारे सम्मुख प्रकट हो उठती है। कवि के अनुसार, साहित्य में आत्मीयता का बड़ा महत्त्व है। यहाँ स्नेह की, संवेदना की सरिता कूल-किनारों को डुबा-डुबाकर बहती है। कविता के प्रति यह आस्था ही गोपाल सिंह नेपाली को एक विशिष्ट कवि बनाती है जिन्होंने जीवन-भर उसे एक ध्वज की तरह उठाए रखा।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910143594647,"sku":"9789360866501","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360866501.webp?v=1770876736","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360866501-ragini","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}