{"product_id":"9789360866693-uski-ichchhaon-mein-baarish-thi","title":"Uski Ichchhaon Mein Baarish Thi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Devyani Bhardwaj\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e‘उसकी इच्छाओं में बारिश थी’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e स्त्री-कविता का एक नया दस्तावेज़ है जिसमें जीवन की सच्चाइयाँ आक के पौधे-सी दिख रही हैं, खेजड़ी के पेड़-सी। जून महीने की दोपहर, निर्जन किसी इलाक़े में चलती जाती हुई यह कवि समझ चुकी है कि प्रेम की कामना प्रेम से बड़ी सच्चाई है। ऐसी कई सच्चाइयों को वह समझ चुकी है—वह न्याय माँगती है समाज से, जानती हुई कि इस पितृसत्ता में उसके लिए ऐसी कोई सुनवाई सम्भव नहीं। वह याद करती है अपनी रिश्तेदार औरतों को—बुआ को, मामी को, मौसी, दादी, नानी को—सबका जीवन इसी पितृसत्ता के विष में लिथड़ा हुआ मिलता है। वह अपनी भाषा में कविता को अपनी सहेली बनाकर लाती है, समझती हुई कि वह भी स्त्री की आदिम यात्रा में एक घायल राहगीर है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e देवयानी की कविताओं की परिपक्वता उनकी अपनी ही संवेदना के परिष्कार का प्रतिफल है। कवि ने अपने हृदय में प्रेम के टूटने की आवाज़ सुनी है, कपास में किसान की मेहनत देखी है, बेटी को पितृसत्ता का पाठ पढ़ाते एक माँ को सुना है, एक स्त्री को इच्छा के पुल पर खड़ी देखा है जो कहीं जाना चाहती है। यह सबकुछ देखते हुए उनकी कविता उनके पास आती है, इसलिए उनकी कविता निराश नहीं है बल्कि विवेकसंगत ढंग से आशावान है। उसके सपनों में बादल आते हैं, न कि बसा-बसाया कोई घर जिसमें उस पर हुकूमत करने वाले लोग रहते हों। स्त्री का इन्तज़ार कितना बदल गया है इन कविताओं से पता चलता है! ये कविताएँ एक जागी हुई स्त्री की कविताएँ हैं जिसके सपने प्रौढ़ हो गए हैं, जिसकी आँखें अब कोई भ्रम नहीं पालतीं। जिस स्त्री ने बारिश का इन्तज़ार करना सीख लिया, जिसका दमन अब मुश्किल है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003eउसकी इच्छाओं में बारिश थी\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e संग्रह एक शाम हो रही सुखद बारिश की तरह है जिसमें ठंडी हवाएँ चल रही हों और जो असमानता और अन्याय से उपजी भीषण उमस-भरी किसी दोपहर से निजात दिलाती हों। साथ में यह उम्मीद भी जगाती हों कि स्त्री अपनी नई संवेदना को प्रकट करने में अब हिचकिचाएगी नहीं बल्कि देवयानी की ही तरह कविता को भी साथ-साथ नया करती चलेगी।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e—सविता सिंह \u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910140973207,"sku":"9789360866693","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360866693.webp?v=1770876730","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360866693-uski-ichchhaon-mein-baarish-thi","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}