{"product_id":"9789360869021-bas-chaand-royega","title":"Bas Chaand Royega","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Madan Kashyap\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eमदन कश्यप की कविता इस लोक को सम्बोधित कविता है। वह इसी छोटे लेकिन मनुष्य के लिए फिर भी बहुत बड़े लोक को जीना चाहती है। यह देह जो नश्वर है, उसके लिए बहुत कुछ है क्योंकि इसी देह के झरोखे पर बैठकर आँखें उस दुनिया को देखती हैं जिसे अन्तत: हमें जीना है। यह कविता कहती है कि ईश्वर हो, लेकिन वह उतना काम्य नहीं है जितना मनुष्यों में मनुष्यता। मनुष्यता की क़ीमत पर वह ईश्वर नहीं चाहिए जिसे वे लोग मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकें, जो ख़ुद ईश्वर होना चाहते हैं। यह कविता नहीं चाहती कि दुनिया में इतना ज़्यादा ईश्वर हो जाए कि ‘जय श्रीराम’ कहकर किसी मनुष्य को मार देना धार्मिक लगने लगे। ये कविताएँ विजय के ऊपर शान्ति को तरजीह देती हैं और वीरता के ऊपर जीवन के सातत्य को। इस तरह ये कविताएँ विकास और विध्वंस के दुश्चक्र में फँसे जीवन को एक रास्ता दिखाती हैं। यह मदन कश्यप का नया संग्रह है। अपनी कविताओं में उन्होंने लोक को, लोक की भाषा को, जीवन में प्रकृति की अनवरत उपस्थिति को और संसार में एक साधारण मनुष्य की महिमा को अत्यन्त ग्राह्य शब्द-चित्रों में साकार किया है। ‘बस चाँद रोएगा’ संग्रह में उनकी इधर की कविताएँ संकलित हैं, इनमें देश का वर्तमान, वर्तमान को अपने स्वार्थों के अनुसार गढ़ती-बदलती राजनीति और कोरोना जैसी महामारी और युद्धों से पैदा हुई विडम्बनाओं के चिह्न भी मौजूद हैं; और इस माहौल में अपनी निजी पीड़ाओं और मानवीय सरोकारों के साथ जीता व्यक्ति भी, और वह उम्मीद, वह प्रेम, वह स्पर्श भी जो विनाश की तमाम कोशिशों के बावजूद बचे रहते हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46910149001367,"sku":"9789360869021","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360869021.webp?v=1770876788","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789360869021-bas-chaand-royega","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}