{"product_id":"9789386863003-kukurmutta","title":"Kukurmutta","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Suryakant Tripathi 'Nirala'\u003cbr\u003e • Publisher: LokBharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: LokBharti Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eअर्थ-समस्या में निरर्थकता को समूल नष्ट करना साहित्य और राजनीति का कार्य है। बाहरी लदाव हटाना ही चाहिए, क्योंकि हम जिस माध्यम से बाहर की बातें समझते हैं वह भ्रामक है, ऐसी हालत में ‘इतो नष्टस्ततो भ्रष्ट:' होना पड़ता है। किसी से मैत्री हो, इसका अर्थ यह नहीं कि हम बेजड़ और बेजर हैं। अगर हमारा नहीं रहा तो न रहने का कारण है, कार्य इसी पर होना चाहिए। हम हिन्दी-संसार के कृतज्ञ हैं, जिसने अपनी आँख पाई हैं। इस पथ में अप्रचलित शब्द नहीं। बाज़ार आज भी गवाही देता है कि किताब चाव से ख़रीदी गई, आवृत्ति हज़ार कान सुनी गई और तारीफ़ लाख मुँह होती रही। इसका विषयवस्तु, शिल्प, भाषिक संरचना और अभिव्यक्ति की नई एकान्विति के कारण अद्‌भुत रूप से महत्त्वपूर्ण है। इन आठों कविताओं का मिज़ाज बिलकुल एक-सा है। उनकी ताज़गी, उनके शब्द-प्रयोग, उनकी गद्यात्मकता का कवित्व, भाषा का अजीब-सा छिदरा-छिदरा संघटन, अन्दर तक चीरता हुआ व्यंग्य और उन्मुक्त हास्य-क्षमता तथा कठोरता के कवच में छिपी अगाध (अप्रत्यक्ष) करुणा और उपेक्षित के उन्नयन के प्रति गहरी आस्था ‘निराला' की रचना-सक्षमता और काव्य-दृष्टि के एक नए  (सर्वथा अछूते नहीं) आयाम को हमारे सामने उद्‌घाटित करती है। प्रस्तुत संग्रह ‘कुकुरमुत्ता’ की व्यंग्य और भाषा आधुनिक है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"LokBharti Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46910169448599,"sku":"9789386863003","price":347.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789386863003.webp?v=1770876983","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/9789386863003-kukurmutta","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}