{"product_id":"aangan-mein-ek-vriksha-9788183613750","title":"Aangan Mein Ek Vriksha","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Dushyant kumar\u003cbr\u003e • Publisher: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eदुष्यन्त कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउपन्यास में एक सामन्ती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामन्त ज़मीन और उससे मिलनेवाली दौलत को क़ब्ज़े में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ़ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अन्तत: सामन्त भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय रुतबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है, इसका ख़ुद उसे भी अहसास नहीं होता।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चन्दन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग के हों—सब अपने परिवेश में पूरी जीवन्तता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है, और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eदुष्यन्त कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है—कहीं एक भी शब्द न फ़ालतू, न सुस्त।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअत्यन्त पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"Radhakrishna Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285688606871,"sku":"9788183613750","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788183613750.webp?v=1769284074","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/aangan-mein-ek-vriksha-9788183613750","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}