{"product_id":"aapatkal-ek-diary-2-9788181493596","title":"Aapatkal: Ek Diary-2","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Bishan Tandon\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eइक्कीस महीने की अवधि में (1 नवंबर, 1974-24 जुलाई, 1976) दिन-प्रतिदिन लिखी गई इस डायरी का प्रथम खण्ड नवम्बर, 2002 में प्रकाशित हुआ था। डायरी का दो खण्डों में संयोजन केवल सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है, किसी अन्य आधार पर नहीं। कई कारणों से दूसरे खण्ड के प्रकाशन में कुछ विलम्ब हुआ है। डायरी क्यों और किस पृष्ठभूमि में लिखी गई इसका विवरण पहले खण्ड की भूमिका में विस्तार से दिया जा चुका है।भारती परम्परा में वाङ्मय का परम लक्ष्य सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् ही माना जाता है। एक अर्थ में यह डायरी साहित्यिक कृति नहीं लगेगी, क्योंकि साहित्य में कल्पना का उपयोग आवश्यक है, जबकि डायरी लिखने में मैंने एक यथार्थ का वर्णन किया है और कल्पना की भाषा का कोई उपयोग नहीं किया है। मैंने जो भी लिखा है, वह सत्य ही है। सत्य एक होते हुए भी प्रत्येक आदमी इसे अलग-अलग प्रकार से ग्रहण करता है। किसी को एक बात प्रिय लगती है तो वही किसी और को कड़वी लगती है। मैं मानता हूँ जैसे भी पाठकों की प्रतिक्रिया रही हो, यह सबके लिए शिव ही होगा, क्योंकि एक काल में राजनैतिक और प्रशासनिक कार्य-प्रणाली का बहुत स्पष्ट चित्र इसमें प्रस्तुत है, उस कार्य प्रणाली के सौंदर्य के बारे में पाठक अपना निजी निर्णय करने में सक्षम हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523143159959,"sku":"9788181493596","price":325.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788181493596.webp?v=1767180248","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/aapatkal-ek-diary-2-9788181493596","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}