{"product_id":"aveni-9788188267354","title":"Aveni","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Sneh Mohnish\u003cbr\u003e • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • BISAC: Sea Stories\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eअवेणि“ददा से भेंट करे बर गए रहै का, दाई?”“हाहो।”“भेंट होए रहिसे?”“ना, टाइम नहीं रहिसे, कल आए बर बोले हे।”“दाई, शिवराम कका आए रहै।”“अच्छा, क्या कहता रहा?”“कहता रहा, कोरट से जमानत कराना हो तो जमानतदार लाना होगा, वकील करना होगा।”“हाँ, ये तो है।” लक्षन ने एक आह भरी थी, “घर मा मनखे जात के रहे ले घर के मरजादा तोपाय रहिथय, मनखे बिगर सबके डौकी जात के कोनों पूछ नई होवय।”दिन भर थाने, जेल, सुनार सबके पास से दुरदुराए जाने की पीड़ा लक्षन के स्वर में उभर आई थी।“दाई, का राँधवो?” मनबोधनी उसके सिरहाने चिंतित खड़ी थी।“कुछ कानी राँध ले।” लक्षन दिन भर के परिश्रम व थकान के कारण नीम बेहोश-सी हो चली थी। ताप की कमजोरी तो थी ही देह में।“हाहो।”—इसी उपन्यास सेहमारे देश में सभ्य और संभ्रांत समाज से इतर एक ऐसा समाज भी है, जो झोंपड़-पट्टी में रहकर दुनिया के तमाम दु:ख भोगता है। इसे उसकी नियति कहें या विडंबना अथवा क्या? प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे ही समाज के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, शादी-विवाह आदि का बड़ी खोजपरक दृष्‍टि से विशद वर्णन पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश करता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46839507320983,"sku":"9788188267354","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788188267354.webp?v=1769160955","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/aveni-9788188267354","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}