{"product_id":"ayodhya-ki-lok-kala-ek-adhyayan-9789389915808","title":"Ayodhya Ki Lok Kala Ek Adhyayan","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Radhika Devi\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकला में सत्यम, शिवम, सुन्दरम् तीनों गणों का समावेश होना चाहिए। जिस कलाकृति में यह तीनों गण जितनी अधिक मात्रा में होंगे वह कलाकृति उतनी ही अधिक पूर्ण होगी। शिव की भावना कल्याण की भावना है। जब कलाकार यह सोचता है कि यदि उसमें शिवम् का अभाव है तो भी कलाकृति पूर्ण है बस कलाकृति में सत्यम् और सुन्दरम् गुण जब अधिकाधिक होंगे तभी वह कला, कला के लिए होगी। वास्तव में शिवम् के बिना कलाकृति अधूरी है। कला काम करने की वह शैली है जिससे हमें सुख या आनन्द मिलता है। वैसे कला का नाम लेने पर हमें ललित कलाओं जैसे संगीतकला, चित्रकला, काव्यकला, नृत्यकला आदि का बोध होता है। परन्तु ये सभी कलाएँ जीने की कला के अन्तर्गत हैं या हम यों कह सकते हैं कि जीने की कला इन सभी की माता है। जीने की कला में अच्छी तरह सफल होना हमारा जीवन लक्ष्य है और सब कलाएँ इसमें योग देती हैं। इस प्रकार चेतन रचनाएँ भी दो प्रकार की हैं। एक रचना वह जो भौतिक सुख के लिए होती है और दूसरी वह जो आत्मिक सुख के लिए होती है। जैसे खेती करना भौतिक सुख के लिए है और माली का सुन्दर उपवन लगाना आत्मिक आनन्द के लिए है। भिक्षा माँगने वाली नर्तकी का नृत्य भौतिक सुख के लिए होता है, पर आत्मा के आनन्द के लिए भी नर्तकी नृत्य करती है। इसलिए लोककलाएँ जैसे संगीतकला, नृत्यकला, चित्रकला आदि उत्कृष्ट आत्मिक सुख प्रदान करने वाली कलाएँ हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46523128742039,"sku":"9789389915808","price":270.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789389915808.webp?v=1767180167","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ayodhya-ki-lok-kala-ek-adhyayan-9789389915808","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}