{"product_id":"basharat-manzil-9788126723324","title":"Basharat Manzil","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Manzoor Ehtesham\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Ancient, Classical \u0026amp; Medieval\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e...एक उपन्यास जो लगभग दिल्ली ही के बारे में है—पुरानी यानी सन् 47 से पहले की दिल्ली।मेरी कहानी 15 अगस्त, 1947 तक घिसटती नहीं जाती, उससे पहले ही ख़त्म हो जाती है। हाँ, यक़ीनन जो कुछ भी उसमें होना होता है, वह इस तारीख़ से पहले ही हो-हुआ चुकता है।एक व्यक्ति और उसके परिवार की कहानी जो एक ज़माने में हर जगह था। शायरी से लेकर सियासत यानी तुम्हारे शब्दों में हक़ीक़त से लेकर फ़साने तक, हर जगह। लेकिन आज जिसका उल्लेख न तो साहित्य में है, न इतिहास में। संजीदा सोज़ और बशारत मंज़िल की कहानी। बिल्लो और बिब्बो की कहानी। ग़ज़ल की कहानी। इन तीनों बहनों की माँ, अमीना बेगम की कहानी। सोज़ की दूसरी पत्नी, जो पहले तवायफ़ थी और उसके बेटे की कहानी। सारी कहानियों की जो एक कहानी होती है, वह कहानी। मेरी और तुम्हारी कहानी भी उससे बहुत हटकर या अलग नहीं हो सकती। न है।चावड़ी बाज़ार? —मैंने कहना शुरू किया था—चलो, यहाँ से अन्दाज़न उलटे हाथ को मुड़कर क़ाज़ी के हौज़ से होते हुए सिरकीवालों से गुज़रकर लाल कुएँ तक पहुँचो। उसके आगे बड़ियों का कटरा हुआ करता था। वहाँ से आगे चलकर नए-बाँस आता था। वह सीधा रास्ता खारी बावली को निकल गया था। नुक्कड़ से ज़रा इधर ही दाएँ हाथ को एक गली मुड़ती थी। वह बताशोंवाली गली थी। एक ज़माने में वहाँ बताशे बनते आँखों से देखे जा सकते थे। बाद में वहाँ अचार-चटनी वालों का बड़ा मार्केट बन गया था। मार्केट के बीच से एक गली सीधे हाथ को मुड़ती थी। थोड़ी दूर जाकर बाईं तरफ़ एक पतली-सी गली उसमें से कट गई थी। इस गली में दूसरा मकान बशारत मंज़िल था : पुरानी तर्ज़ की लेकिन नई-जैसी एक छोटी हवेलीनुमा इमारत। एक ज़माने में वह मकान अपने-आप में एक पता हुआ करता था मगर फिर वीरान होता गया। कुछ लोग उसे आसेबज़दा समझने लगे, दूसरे मनहूस। आज तो यक़ीन के साथ यह भी नहीं कह सकते कि वह अपनी जगह मौजूद है या नहीं।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":48265322397847,"sku":"9788126723324","price":245.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126723324.webp?v=1789380039","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/basharat-manzil-9788126723324","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}