{"product_id":"bidhar-9788119159031","title":"Bidhar","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Bhalchandra Nemade | Tr. Rangnath Tiwari\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘बिढार’ का मतलब है—अपने कन्धे पर अपनी गृहस्थी का बोझ लादे हुए भटकना। इस दिक्-काल से परे की भटकन का मक़सद है, शायद, गौतमबुद्ध की तरह संबोधि प्राप्त करना। अपने आपको, अपनों को, अपनापे को पाना। बिढार के चांगदेव की यह भटकन, भाषा-प्रदेश और काल को लाँघकर सार्वजनीन और बीसवीं शताब्दी के डॉक्यूमेन्ट्स को लेकर सार्वकालिक बन जाती है। यह कहीं भी ख़त्म न होनेवाली भटकन, जिसका प्रारम्भ 1962 में हुआ था, वह ‘बिढार’ (1975), ‘जरीला’ (1977) और ‘झूल’ (1979) को पार कर अब अपने आगे के मुकाम ‘हिन्दू’ की ओर अग्रसर है। यह परकाया प्रवेश करनेवाले एक की आपबीती है जो अपने विस्तार में अनेक को समाहित करने का सामर्थ्य रखती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयह मानव-सभ्यता की कैसी विडम्बना है कि सृजन-क्षमता के विनाश को स्वीकार किए बिना मनुष्य\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eको समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होती। विपात्र बनो और प्रतिष्ठा प्राप्त करो। सत् (बीइंग) और कर्तृत्व (बिकमिंग) का घोर कुरुक्षेत्र नेमाड़े जी के उपन्यास—‘चतुष्ट्य’ का दहला देनेवाला अन्तःसूत्र है। जीवन के नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व की व्यग्रता का भाव नेमाड़े जी के ‘बिढार’ में जिस अभिनिवेश शून्य परन्तु रचनात्मक स्वरूप में पाया जाता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e—रंगनाथ तिवारी\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285686247575,"sku":"9788119159031","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788119159031.webp?v=1769284065","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/bidhar-9788119159031","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}