{"product_id":"chhutkara-9788180315404","title":"Chhutkara","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Mamta Kaliya\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eअपनी कहानियों के बारे में स्वयं लेखिका का कहना है : “प्रस्तुत कहानियों में से कुछ ऐसी हैं जो अपने आप मुझ तक चली आई हैं। ‘छुटकारा’ में कच्ची धान की गन्ध है, लेकिन भावुकता नहीं। सन् साठ के बाद के लेखकों की तरह मैंने भी भावुकता का बोझ उतार फेंककर ही कहानी की दुनिया में क़दम रखा...।”\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eजीवन के दैनिक उतार-चढ़ाव में हम जो देखते हैं, वह चेतना के एक कोने में जमा रहता है और अपनी कहानियाँ बनाता-बुनता रहता है। ममता कालिया का समर्थ कथाकार इसी बुनावट को अपनी भाषा में इतने सुग्राह्य और स्पष्ट रूप में उकेरता है कि कहानी एक गठी हुई टिप्पणी की तरह हमारे मन-मस्तिष्क में अंकित हो जाती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइस संग्रह में शामिल ‘बड़े दिन की पूर्व साँझ’, ‘वे तीन और वह’, ‘यह ज़रूरी नहीं’, ‘बीमारी’, ‘अपत्नी’, ‘छुटकारा’, ‘उसी शहर में’, ‘ज़िन्दगी : सात घंटे बाद की’, ‘पिछले दिनों का अँधेरा’, ‘साथ’—ये सभी कहानियाँ पठनीयता की उस अनिवार्य शर्त को भी पूरा करती हैं जो इधर अकसर संकट में दिखाई देती हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285559959703,"sku":"9788180315404","price":63.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788180315404.webp?v=1769283759","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/chhutkara-9788180315404","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}