{"product_id":"darshanshastra-ke-srot-9789394902923","title":"Darshanshastra Ke Srot","description":"\u003cp\u003e • Author(s): D. P. Chattopadhyay | Tr. Sushila Dobhal\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eविश्व-दर्शन की मुख्य धारा में विभिन्न कालों के विभिन्न लोगों ने सकारात्मक या नकारात्मक\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eअपने-अपने तरीक़े से योगदान किया है। इस मुख्य धारा में अनेक धाराएँ मिली हुई हैं\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजिनसे सामान्य पाठकों का परिचय कराने के लिए आठ पुस्तकों की यह शृंखला तैयार की गई है। प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की प्रस्तुत पुस्तक इसी शृंखला की पहली कड़ी है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eश्री चट्टोपाध्याय इस पुस्तकमाला के प्रधान सम्पादक हैं और साथ ही \u003cstrong\u003e‘\u003c\/strong\u003eदर्शनशास्त्र के स्रोत\u003cstrong\u003e’ \u003c\/strong\u003eशीर्षक प्रस्तुत पुस्तक के लेखक भी। अत: उनकी यह पुस्तक एक प्रकार से पूरी शृंखला की पूर्व-पीठिका है। इस पुस्तक में उन्होंने\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eदर्शन के स्रोतों की खोज की है\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eऔर शृंखला की अगली पुस्तकों को पढ़ने-समझने का संस्कार पैदा करने की आधारशिला का निर्माण भी किया है। \u003cstrong\u003e‘\u003c\/strong\u003eदर्शनशास्त्र की आवश्यकता क्यों है\u003cstrong\u003e’ \u003c\/strong\u003eसे प्रारम्भ करके वे आदि-मानव के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं और फिर समाज में कर्म-विभाजन की शुरुआत\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eनगर क्रान्ति\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजीवन में धर्म की भूमिका आदि को रेखांकित करते हुए इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि दर्शन का जन्म और विकास कैसे हुआ। इस समस्त विवेचन के क्रम में विश्व की प्राचीन चिन्तन-पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय भी पाठकों को मिल जाता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रो. चट्टोपाध्याय ने यहाँ थेल्स के बारे में किए गए इस दावे पर प्रश्न-चिह्न लगाया है कि वह पहला वैज्ञानिक था। ऐसा उन्होंने \u003cstrong\u003e‘\u003c\/strong\u003eछान्दोग्य उपनिषद\u003cstrong\u003e’ \u003c\/strong\u003eके उद्दालक आरुणि से सम्बन्धित अंश का विवेचन करते हुए किया है। उनके अनुसार\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eउद्दालक आरुणि के विज्ञान के प्रति सुस्पष्ट रुझान को देखते हुए विश्व विज्ञान के इतिहास का गम्भीर पुनरीक्षण आवश्यक है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकहना न होगा कि प्रो. चट्टोपाध्याय की सामाजिक दृष्टि और बौद्धिक तटस्थता से अनुप्राणित यह पुस्तक दर्शन के अध्येताओं के साथ-साथ उन पाठकों के लिए भी रुचिकर होगी\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजो दर्शन के अध्ययन की शुरुआत ही कर रहे हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285662392471,"sku":"9789394902923","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789394902923.webp?v=1769284008","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/darshanshastra-ke-srot-9789394902923","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}