{"product_id":"devaki-hona-yashoda-bhi-9789350008638","title":"Devaki Hona Yashoda Bhi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Dr. Manorama Bishwal Mahapatra\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eआज उदासीन धरती पर मैं अपनी कविता के अन्तरंग अनुभवों से टिकी हुई हूँ। अपनी कविता में मैं आत्मीय अनुभूतियों को अकृत्रिम रूप में ही अभिव्यक्त करना चाहती हूँ । समकालीन समय सर्जनशीलता पर अधिक जोर देता-सा नहीं लगता। अपने प्रयोजन के मानक में वह उसे तोलना चाहता है । आज चेतना की सूक्ष्मता अपनी सुकुमारिता खोती जा रही है यह अहसास भी होने लगा है, अतः कवि अनजाने में पाठकों के लिए एक वस्तु सा बनता जा रहा है; फिर भी वह किसी को आहत करना नहीं चाहता। किन्तु, उसमें सत्य, शिव और सुन्दर के प्रति आस्था बनी रहती है । और मुझे लगता है मानो मेरी कविता मेरे लिए काल से काल को जोड़ने का सम्पर्क सूत्र है, अटूट । वह मंगल सूत्र के समान सुरक्षित, संरक्षित है उसी से मेरा काव्य-जीवन अवक्षयित समय के द्वारा कतई कलंकित नहीं हुआ है। सौन्दर्यबोध, अनुराग मेरी कविता की सुकुमारिता है । मेरी कविताओं के इस संकलन, 'देवकी होना, यशोदा भी...' में मेरे लिए मानो उपस्थित वर्तमान में महत्त्वपूर्ण है शैशव । विशाल जीवन में सुन्दर स्नेहमय और आत्मीयता के उपादानों में शैशव ही भरा पूरा कर देता है। लगता है सुन्दर बचपन था जिसका, वह ही है सब से अधिक सौभाग्यशाली ।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523066155159,"sku":"9789350008638","price":98.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789350008638.webp?v=1767179796","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/devaki-hona-yashoda-bhi-9789350008638","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}