{"product_id":"ek-bataa-do-9789388753685","title":"Ek Bataa Do","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Sujata\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eपद्मिनी नायिकाओं-सी अगाधमना लड़कियाँ जब महानगर के गली-कूचों में जन्मे और अपने मायकों की खटर-पटर से निजात पाने के लिए उस पहले रोमियो को ही ‘हाँ’ कर दें जिसने उन्हें देखकर पहली ‘आह’ भरी तो जीवन मिनी-त्रासदियों का मेगा-सिलसिला बन ही जाता है और उससे निबटने के दो ही तरीक़े बच जाते हैं—पहला, ख़ुद को दो हिस्सों में फाड़ना। जैसे सलवार-कुरते का कपड़ा अलग किया जाता है, वैसे शरीर से मन अलग करना। मन को बौद्ध भिक्षुणियों या भक्त कवयित्रियों की राह भेजकर शरीरेण घर-बाहर के सब दायित्व निभाए चले जाना! दूसरे उपाय में भी बाक़ी दोनों घटक यही रहते हैं पर भक्ति का स्थानापन्न प्रेम हो जाता है—प्रकृति से, जीव-मात्र से, संसार के सब परितप्त जनों से और एक हमदर्द पुरुष से भी जो उन्हें ‘आत्मा का सहचर’ होने का आभास देता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eस्वयं से बाहर निकलकर ख़ुद को द्रष्टा-भाव में देखना और फिर अपने से या अपनों से मीठी चुटकियाँ लिए चलना भी स्त्री-लेखन की वह बड़ी विशेषता है जिसकी कई बानगियाँ गुच्छा-गुच्छा फूली हुई आपको हर क़दम पर इस उपन्यास में दिखाई देंगी! हर कवि के गद्य में एक विशेष चित्रात्मकता, एक विशेष यति-गति होती है, पर यह उपन्यास प्रमाण है इस बात का कि स्त्री-कवि के गद्य में रुक-रुककर मुहल्ले की हर टहनी के फूल लोढ़ते चली जानेवाली क़स्बाई औरतों की चाल का एक विशेष छंद होता है। अब हिन्दी में स्त्री उपन्यासकारों की एक लम्बी और पुष्ट परम्परा बन गई है। सुजाता का यह उपन्यास उसे एक सुखद समृद्धि देता है और ज़रूरी विस्तार भी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e—अनामिका\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285699322007,"sku":"9789388753685","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789388753685.webp?v=1769284101","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ek-bataa-do-9789388753685","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}