{"product_id":"ek-bharam-achchha-jiya-9789360865122","title":"Ek Bharam Achchha Jiya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Pradeep Awasthi\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eसघन अस्त‌ित्व-बोध, प्रेम, समय और समाज के शोर के बीच अपने कुछ सम्पूर्ण पलों की तलाश और बाहर की अपेक्षाओं के चलते अपने आप से छिटकते मन की बेचैनियाँ—यह सब ‘एक भरम अच्छा जिया’ के कव‌ि प्रदीप अवस्थी को थोड़ा अलग बनाता है, और उनकी कव‌िताओं को भी।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e गिड़गिड़ाते हुए लोगों की आँखों में झाँककर देखा जाना चाहिए\/वे बचाना चाहते हैं कुछ ऐसा\/जो जीवन-भर सालता रहेगा।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e उनकी कविताएँ दुनिया की विसंगतियों, अन्याय और विद्रूप को तो पहचानती ही हैं, वे उस काम्य की क्षुद्रता को भी समझती हैं, जिसे चाहने और पाने के लिए एक बदहवासी हर तरफ़ नज़र आती है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e जो दौड़ है, और जो होड़ है, उसके आक्रामक घटाटोप के बीच कोई है जो स्वयं को असहाय पा रहा है, ये कविताएँ उसे बचाना चाहती हैं, वह आदमी जो कुछ इसलिए कि यह भागमभाग उसे मानव-सुलभ ऊँचाई के बरक्स कुछ कमतर लगती है, और कुछ इसलिए कि वह उसमें अपनी जगह भी नहीं देख पाता, इसलिए स्वेच्छा से इससे दूर खड़ा है, ये कविताएँ उसकी ओर से हैं। वह कहता है—शालीन लोगों की यह दुनिया\/अश्लील नियमों से चलती है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e इस दुनिया में जो प्रचलित है—वह प्रेम हो, सम्बन्ध हों, नियम-क़ायदे हों, हर चीज़ के एकाधिक रूप साथ-साथ काम करते दिखाई देते हैं, एक सच और झूठ, और दोनों ही स्वीकृत। यही वह चीज़ है जो एक संवेदनशील हृदय को लगातार पीड़ा में रखती है। इन कविताओं में वही पीड़ा अभिव्यक्त हुई है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47716887199895,"sku":"9789360865122","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360865122.webp?v=1776940566","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ek-bharam-achchha-jiya-9789360865122","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}