{"product_id":"gandhi-ek-asambhav-sambhavna-9788126729555","title":"Gandhi Ek Asambhav Sambhavna","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Sudhir Chandra\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसाल-दर-साल दो बार गांधी को रस्मन याद कर बाक़ी वक़्त उन्हें भुलाए रखने के ऐसे आदी हो गए हैं हम कि उनके साथ हमारा विच्छेद कितना गहरा और पुराना है, इसकी सुध तक हमें नहीं है। एक छोटी-सी, पर बड़े मार्के की, बात भी हम भूले ही रहे हैं। वह यह कि पूरे 32 साल तक गांधी अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ लड़ते रहे, पर अपने ही आज़ाद देश में वह केवल साढ़े पाँच महीने—169 दिन—ज़िन्दा रह पाए। इतना ही नहीं कि वह ज़िन्दा रह न सके, हमने ऐसा कुछ किया कि 125 साल तक ज़िन्दा रहने की इच्छा रखनेवाले गांधी अपने आख़िरी दिनों में मौत की कामना करने लगे। अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उन्होंने आज़ाद हिन्दुस्तान में। उस दिन शाम को प्रार्थना-सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा : ‘‘मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िन्दा पड़ा हूँ। इस पर मुझको ख़ुद आश्चर्य होता है, शर्म लगती है, मैं वही शख़्स हूँ कि जिसकी ज़ुबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोड़ों उसको मानते थे। पर आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगे’ ऐसा कहते हैं।...ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िन्दा रहकर क्या करूँगा? आज मेरे से 125 वर्ष की बात छूट गई है। 100 वर्ष की भी छूट गई है और 90 वर्ष की भी। आज मैं 79 वर्ष में तो पहुँच जाता हूँ, लेकिन वह भी मुझको चुभता है।’’\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eक्या हुआ कि गांधी ऊपर उठा लिए जाने की प्रार्थना करने लगे दिन-रात? कौन-सी बेचारगी ने घेर लिया उन्हें? क्यों 32 साल के अपने किए-धरे पर उन्हें पानी फिरता नज़र आने लगा? निपट अकेले पड़ गए वह।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eगांधी के आख़िरी दिनों को देखने-समझने की कोशिश करती है यह किताब। इस यक़ीन के साथ कि यह देखना-समझना दरअसल अपने आपको और अपने समय को भी देखना-समझना है। एक ऐसा देखना-समझना, गांधी की मार्फ़त, जो शायद हमें और हमारी मार्फ़त हमारे समय को थोड़ा बेहतर बना दे।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eगहरी हताशा में भी, भले ही शेखचिल्ली की ही सही, कोई आशा भी बनाए रखना चाहती है गांधी को एक असम्भव सम्भावना मानती है यह किताब।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285681528983,"sku":"9788126729555","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126729555.webp?v=1769284055","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/gandhi-ek-asambhav-sambhavna-9788126729555","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}