{"product_id":"gantantra-ka-ganit-9788170555445","title":"Gantantra Ka Ganit","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Narendra Kohli\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eगणतंत्र का गणित - अक्सर यह देखने में आया है कि सामाजिक विसंगतियों पर चोट करने के लिए उपदेश या भाषण की तुलना में व्यंग्य एक अधिक कारगर विधा है। हल्की-हल्की हँसी और तीख़ेपन के साथ कही गयी बातें भारी-भारी नसीहतों की तुलना में लोगों के दिलों में कहीं ज़्यादा घर करती हैं। इसीलिए हिन्दी में व्यंग्य की एक सुदीर्घ परम्परा है। बालमुकुन्द गुप्त और बालकृष्ण भट्ट की तो बात ही क्या, भारतेन्दु ही से व्यंग्य की यह धारा हिन्दी में बहने लगती है और हरिशंकर परसाई और शरद जोशी तक पहुँचते-पहुँचते एक स्थापित विधा का रूप ले लेती है। आज ऐसा कोई समाचार पत्र या साप्ताहिक पत्रिका नहीं होगी जिसमें व्यंग्य का अनिवार्य स्थान न हों।नरेन्द्र कोहली एक जाने-माने कथाकार और उपन्यासकार ही नहीं, एक चर्चित व्यंग्यकार भी हैं। अपनी कहानियों और उपन्यासों को लिखने के साथ-साथ वे बीच में व्यंग्य लेखों और टिप्पणियों पर भी हाथ आज़माते रहते हैं। सहज सरल और चुटीली भाषा-शैली और रोज़मर्रा के जीवन से उठाये गये प्रसंग-नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य लेख हमारे आपके इर्द-गिर्द के जीवन से सम्बद्ध हैं। इसीलिए शायद इनकी पहुँच इतनी व्यापक है। विषय चाहे साम्प्रदायिकता हो या शादी या अवैध कब्ज़े या फिर अन्धविश्वास का - नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य-भरा नश्तर समान रूप से पाखण्ड को उजागर करने के लिए अपनी चीर-फाड़ करता रहता है। अक्सर उन्होंने 'रामलुभाया' जैसा एक पात्र भी अपनी इन टिप्पणियों में कल्पित किया है। जिसके माध्यम से जो कुछ कहना होता है, वे बखूबी कह देते हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523088666775,"sku":"9788170555445","price":163.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788170555445.webp?v=1767179937","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/gantantra-ka-ganit-9788170555445","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}