{"product_id":"ghananad-ka-kavya-9789388211666","title":"Ghananad Ka Kavya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ramdev Shukl\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eघनानन्द के काव्य में भावस्थितियों के विकास का कोई क्रम बना-बनाया नहीं मिलता, किन्तु उनके शृंगार-काव्य में उसे ढूँढ़ना कठिन भी नहीं है। प्रिय के असाधारण रूप के प्रति आश्रय की रीझ, पूर्वराग की आवेगदशा, असाधारण सुख के अतिरेक के साथ रंकवत लालसा की सीत्कार और ‘शुद्ध सामीप्य’ जैसी तन्मयता वाला संयोग और उस संयोग के बाद स्वभावतः तीव्र विरहानुभूति, यह सब कुछ उनके काव्य में है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eघनानन्द में अतृप्ति है तो इस स्तर की है। इसके आधार पर इनको प्रेम का सुख न प्राप्त कर सकनेवाला भाग्यहीन नहीं घोषित किया जा सकता।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रेम के ऐसे विलक्षण अनुभव के बाद ही घनानन्द का विरह इतना तीव्र आवेगमय, इतना करुण और इतना गम्भीर हो सका है कि संसार की दृष्टि में प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मीन और पतंग इनके सामने कायर और कपूत होकर हर जाते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eघनानन्द के काव्य के शिल्प-पक्ष के सम्बन्ध में भी ऐसे ही निष्कर्ष निकाले गए हैं : ‘कवि की प्रवृत्ति अपने हृदय की परत खोलने की अधिक होती है, अपनी उक्ति को सजाने-सँवारने की कम।’\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285620613271,"sku":"9789388211666","price":63.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789388211666.webp?v=1769283897","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ghananad-ka-kavya-9789388211666","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}