{"product_id":"gyarahvin-a-ke-ladke-9789387462700","title":"Gyarahvin A ke Ladke","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Gaurav Solanki\u003cbr\u003e • Publisher: Sarthak (An imprint of Rajkamal Prakashan)\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Sarthak (An imprint of Rajkamal Prakashan)\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eगौरव सोलंकी नैतिकता के रूढ़ खाँचों में अपनी गाड़ी खींचते-धकेलते लहूलुहान समाज को बहुत अलग ढंग से विचलित करते हैं। और, यह करते हुए उसी समाज में अपने और अपने हमउम्र युवाओं के होने के अर्थ को पकड़ने के लिए भाषा में कुछ नई गलियाँ निकालते हैं जो रास्तों की तरह नहीं, पड़ावों की तरह काम करती हैं। इन्हीं गलियों में निम्न-मध्यवर्गीय शहरी भारत की उदासियों की खिड़कियाँ खुलती हैं जिनसे झाँकते हुए गौरव थोड़ा गुदगुदाते हुए हमें अपने साथ घुमाते रहते हैं। वे कल्पना की कुछ नई ऊँचाइयों तक क़‍िस्सागोई को ले जाते हैं, और अक्सर सामाजिक अनुभव की उन कंदराओं में भी झाँकते हैं, जहाँ मुद्रित हिन्दी की नैतिक गुत्थियाँ अपने लेखकों को कम ही जाने देती हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइस संग्रह में गौरव की छह कहानियाँ सम्मिलित हैं, लगभग हर कहानी ने सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर एक ख़ास क़‍िस्म की हलचल पैदा की। किसी ने उन्हें अश्लील कहा, किसी ने अनैतिक, किसी ने नक़ली। लेकिन ये सभी आरोप शायद उस अपूर्व बेचैनी की प्रतिक्रिया थे, जो इन कहानियों को पढक़र होती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकहने का अन्‍दाज़ गौरव को सबसे अलग बनाता है, और देखने का ढंग अपने समकालीनों में सबसे विशेष। उदारीकृत भारत के छोटे शहरों और क़स्बों की नागरिक उदासी को यह युवा क़लम जितने कौशल से तस्वीरों में बदलती है, वह चमत्कृत करनेवाला है।\u003c\/p\u003e","brand":"Sarthak (An imprint of Rajkamal Prakashan)","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285655543959,"sku":"9789387462700","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789387462700.webp?v=1769283988","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/gyarahvin-a-ke-ladke-9789387462700","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}