{"product_id":"hingwa-ghat-mein-pani-re-9789347265044","title":"Hingwa Ghat Mein Pani Re","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Chandrakishore Jaiswal\u003cbr\u003e • Publisher: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003eभनटा को मालूम था कि हिंगवा घाट पर पुल नहीं बनेगा, फिर भी वह अपने खीसे के चार रुपये चन्दे में दे आया। भला क्यों? क्योंकि उसे लगा कि नेताजी लोग दिल्ली से आए हैं, बोल रहे हैं पुल बनेगा, तो दे‌ दिया चन्दा। पेट भरने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! लेकिन सच बात ये है कि यह उसने इसलिए कहा कि लोग मजाक न बनाएँ। तब तो उसे यकीन हो ही गया था कि पुल बनेगा। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e भारतीय ग्रामीण जीवन के बहुआयामी यथार्थ की व्यापक समझ रखने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल ग्राम्य जन के मनोविज्ञान को भी बखूबी समझते हैं और उसे अपनी कहानियों-उपन्यासों में सम्प्रेषणीय ढंग से पुनर्रचित करते हुए ग्रामीण समाज की एक पूरी तसवीर हमारे सामने रखते हैं। \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e‘हिंगवा घाट में पानी रे’ \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e उनकी ऐसी ही च‌र्चित कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने गाँव के गरीबों और अमीरों के बीच के जटिल ताने-बाने के साथ उनके मनो-मस्तिष्क की संरचना को भी एक साहित्यिक की सहानुभूति और एक समाजविज्ञानी जैसी तटस्थता से बयान किया है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e संग्रह की ‘चौदह अगस्त’ अपनी ज़बान, बयान और कथ्य में एक बड़े क़द की कहानी है। भारत की गुलामी के आखिरी चौदह अगस्त की ये कहानी आजादी बाद के भारत की विडम्बना को थोड़े अलग ढंग से रेखांकित करती है। संग्रह में इसके अलावा संकलित कहानियाँ है ‘बाँट-बखरा’, ‘परदा’, ‘पिया- दुलरी’ और ‘अपहरण’, जो अपने-अपने पात्रों और परिवेश के साथ पाठकों को अत्यन्त प्रिय रही हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Radhakrishna Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47929317326999,"sku":"9789347265044","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789347265044.webp?v=1781763053","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/hingwa-ghat-mein-pani-re-9789347265044","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}