{"product_id":"interval-ke-baad-9789347265419","title":"Interval Ke Baad","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Vidyabhooshan\u003cbr\u003e • Publisher: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e‘‘इंटरवल के बाद’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e में संकलित कहानियों के केन्द्र में मुख्यतः छोटे शहरों का मध्यवर्गीय जीवन और उसकी विभिन्न स्थितियाँ हैं। सामाजिक जवाबदेही के प्रति गहरी सजगता इन कहानियों को एक अलग रंग देती है, और हमें सचेत करती है कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों में किसी भी बदलाव को सावधानीपूर्वक अपनाना चाहिए।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e उदाहरण के लिए संग्रह में शामिल ‘सरे-राह चलते-चलते’ की कमला और विजय एक क्षण‌िक बौखलाहट के चलते शुरू हुए अपने भावनात्मक विचलन को समय रहते इसलिए सँभाल लेते हैं कि उन्हें उसका कोई भविष्य नहीं दिखता, और न ही वे उसके लिए कोई बड़ा जोखिम उठाने की स्थिति में है।\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e ‘एक पिता का जन्म’ शीर्षक कहानी भी एक भविष्यहीन रिश्ते के पनपने से पहले ही अपने सामाजिक दायित्व की ओर लौट जाती है। ‘गली के मोड़ पर दोराहा है’ की नायिका भी सामाजिक सीमाओं को बहुत गहराई से महसूस करती है, लेकिन उसके बरक्स अपने मन में उठते सवाल की अनसुनी भी वह नहीं करती। वह पाठक से ही प्रश्न करती है कि दाएँ मुड़ूँ या बाएँ!\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e पात्रों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल इन कहानियों की विशेषता है, और कथा-प्रवाह इन्हें खासतौर पर पठनीय बनाता है। पारिवारिक और भावनात्मक रिश्तों के अलावा इस संग्रह में ‘पत्थरों की दास्तान’ जैसी कहानी भी है जिसमें शिल्प, विवरण और कथ्य एक अलग ही स्तर पर पाठक के सामने खुलते हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Radhakrishna Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47716885299351,"sku":"9789347265419","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789347265419.webp?v=1776940563","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/interval-ke-baad-9789347265419","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}