{"product_id":"ityadi-9789360867812","title":"Ityadi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Gagan Gill\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसंस्मरणों की गगन गिल की यह दूसरी किताब है। ‘दिल्ली में उनींदें’ पहली थी। वे इन्हें ‘स्मृति-आख्यान’ कहती हैं। स्मृति जिसमें जितने दूसरे रहते हैं, उतना ही हमारा बीता हुआ समय, हमारे वर्तमान से पीछे छूट गया, हमारे स्व का एक हिस्सा, जिसके चिह्न अभी भी हमारे अस्तित्व में कहीं खुबे होते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकुछ क्षण जो कभी-कभी बहुत पास आकर हमें घेर लेते हैं, और कभी-कभी इतनी दूर दिखाई देते हैं कि हम उन्हें एक फ़ासले से देखते हुए शब्दबद्ध कर पाते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eगगन गिल की भाषा को स्मृति का अंकन आता है। वे उन क्षणों को, जो बीत चुके हैं, भाषा के वर्तमान में इस कौशल से पिरोती हैं कि पाठक एक तरफ़ उनके साथ समय के उस खंड में यात्रा भी करता है, और चिन्तन भी करता है, जिसकी प्रेरणा उसे लेखक के आत्म-चिन्तन से मिलती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e‘इत्याद‌ि’ के स्मृति-आख्यानों में आयोवा युनिवर्सिटी के इंटरनेशनल राइटिंग प्रोग्राम के संस्थापक-निदेशक पॉल एंगल से मुलाक़ात, सारनाथ में दीक्षा, कोलकाता में शंख घोष से भेंट व अन्य संस्मरणों के अलावा 1984 के सिख-विरोधी दंगों की भीषण स्मृतियाँ भी हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप सिहर उठते हैं।\u003cstrong\u003e \u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285673173143,"sku":"9789360867812","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360867812.webp?v=1769284032","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ityadi-9789360867812","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}