{"product_id":"jeevan-sangit-9789360865863","title":"Jeevan Sangit","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Dr. Gangubai Hangal | Mrityunjay\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e‘जीवन संगीत’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e विख्यात ख़याल गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल की आत्मकथा है, जो मूलतः कन्नड़ भाषा में लिखी गई थी। पहले यह कन्नड़ से अंग्रेज़ी में अनूदित हुई और अब हिन्दी में आपके सामने है। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003eगंगूबाई हंगल\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e निचली कही जाने वाली जाति में पैदा हुईं, वे उस देवदासी परम्परा से आती थीं जहाँ स्त्रियाँ ब्राह्मण पुरुष की ‘रक्षिता’ होती थीं। लेकिन जाति, जेंडर और परम्परा की कठिनाइयों को चीरती हुई, सामाजिक-आर्थिक मुश्किलों को पार करती हुई वे संगीत के प्रति समर्पण और साधना से भारतीय संगीत जगत के आकाश पर छा गईं। गले के ऑपरेशन के चलते उनकी आवाज़ में एक ‘मर्दाना भारीपन’ आ गया था, लेकिन इस सीमा को भी उन्होंने शक्ति में बदल दिया। \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e ‘संगीत नाटक अकादेमी सम्मान’, ‘तानसेन सम्मान’, ‘पद्म भूषण’ एवं ‘पद्म विभूषण’ जैसे सम्मानों से नवाज़ी गईं गंगूबाई हंगल की यह आत्मकथा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक दौर की गवाही तो देती ही है, साथ ही हमें लगन, मेहनत, जीवट, समर्पण और प्रतिभा की आभा से दमकती ऐसी इनसान से भी मिलवाती है, जिसने कभी हार नहीं मानी, जिसने समाज द्वारा दी गई पहचान का अतिक्रमण कर अपनी अस्मिता ख़ुद गढ़ी।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47716876845207,"sku":"9789360865863","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360865863.webp?v=1776940520","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/jeevan-sangit-9789360865863","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}