{"product_id":"kadambari-2-9788181438782","title":"Kadambari-2","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Vijay Tendulkar\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eविजय तेंडुलकर का उपन्यास 'कादम्बरी-दो' आज के राजनीतिज्ञों में छिपे कूट राजनीतिज्ञों की टेढ़ी चालों में, स्वार्थी दायरों में, दमघोंटू स्थितियों के दौर से गुज़रनेवाले एक शहर की त्रासदियों की कहानी है जो शहर हमें किसी भी शहर में बड़ी आसानी से देखने को मिलता है। दूसरी ओर यह कहानी भेड़िया धँसान प्रवृत्ति की आदी बने उन नगरवासियों की भी है जो किसी भी नगरवासियों की कहानी हो सकती है । चूहों का धीरे-धीरे इतना ढीठ बनना कि मनुष्य की तरह अकड़कर चलना; उनकी दहशत में जीने के लिए मजबूर शहरवासियों का धीरे-धीरे चूहों जैसा कायर, दब्बू बनना, नगरपाल जैसे शहर रक्षक, जनता रक्षक का अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए इन दहशतवादी चूहों को पालना... और एक उत्क्रांति के दौरान (?) आदमकद चूहा बन जाना; अपने इस विद्रुप को भी 'कैश' करने के प्लॉन बनाना आज की राजनीति का वह भयावह, छिपा और खुलने पर बीभत्सदी का चेहरा है जिसके दोहरे-तीहरे शोषण में आम आदमी जीने को बाध्य किया जा रहा है। कभी-कभार यह आम आदमी उन मुस्कैंडे चूहों के अमानुष बलात्कार, पुलिस प्रमुख की खूँखार साजिशें, नगरपाल, नगरसेवकों के घिन आनेतक के स्वार्थी, निर्दयी राजनैतिक दाँवपेंच, जनता के खून चूसने के 'जोंक-तरीके' इनके प्रतिकार में साहस जुटाना भी है तो उसे किस तरह किसम-किसम से इमोशनल ब्लैकमेल किया जाता है इसकी मन विदीर्ण करने वाली यह यथार्थ कहानी प्रतीकात्मकता, रूपकात्मक और फैन्टसी के आश्रय में कुछ इस कदर उद्घाटित हो जाती है कि इस देश की राजनीति के अतीत, वर्तमान, भविष्य के कैनवास एवं संघर्ष पाठकों के मनःपटल पर अपने तमाम संदर्भों के साथ जीवित हो उठते हैं। वैचारिक-भावात्मक बेचैनी, उथल-पुथल के ऐसे मोड़ों पर से हमें ले गुजरते हैं जहाँ सब कुछ बिल्कुल साफ़ दिखाई देने लगता है। अपने मन की अतल गहराइयाँ, दूसरों की चालों के पार्श्व में छिपी मानसिक विकृतियाँ या मजबूरियाँ भी, एक मस्तमौलाना, पागल-से दिखनेवाले अति आम आदमी का सूखी लौकी की बाँसुरी - सा बजाकर इन तमाम गुंडा चूहों को समंदर में ले जाकर डूबोना और सारे मान-सम्मान, नगरपाल पद भी ठुकराकर और अंत में झूठे आरोपों के तहत जेल में बंदी बनकर रहते हुए लौकी की नई-नई प्रजातियाँ विकसित करते रहना-भविष्य में उत्क्रांत हुए चूहे के मनुष्य रूप का या मनुष्य चूहा रूप का सामना करने हेतु - उपन्यास को एक अलग ही बिंदु पर ला खड़ा करता है जहाँ अतीत के सारे अहिंसा संदर्भ उपन्यास को एक अलग ही ऊँचाई दे जाते हैं साथ ही पाठकों को कई आयामों में, परिप्रेक्ष्यों में सोचने को बाध्य कर देते हैं ।यह उपन्यास आम आदमी के जीवन का केन्द्र बनी, जीवन पर हावी हुई षड़यंत्रों भरी राजनीति के इन तमाम अंधकारों को दर्शाते हुए कोई जादुई परिवर्तन या सुखांत हल या आशाप्रद भविष्य के सपने नहीं दिखाता। हाँ, इन दलदलों में जीते हुए, अंधःकारों को सहते हुए भी न थकते हुए साँस लेने की जीजीविषा वृत्ति के प्राणवायु को हमारी धड़कनों में, फेफड़ों में भर जरूर देता है।- पद्मजा घोरपड़े\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523112587415,"sku":"9788181438782","price":228.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788181438782.webp?v=1767180079","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/kadambari-2-9788181438782","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}