{"product_id":"keshar-kasturi-9788126728961","title":"Keshar Kasturi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Shivmurti\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eशिवमूर्ति को पढ़ने का अर्थ है—उत्तर भारत के गाँवों को समग्रता में जानना। गाँव\u003cbr\u003eही शिवमूर्ति की प्रकृत लीला-भूमि है। इसी पर केन्द्रित होकर उनका कथाकार दूर-दूर तक मँडराता है।\u003cbr\u003eगाँव के रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग, जड़ों में धँसे संस्कार, प्रकृत यौन-बुभुक्षा, परत-दर-परत\u003cbr\u003eउजागर होता वर्णवादी-वर्गवादी शोषण, मूल्यहीन राजनीति और उनके बीच भटकती लाचार\u003cbr\u003eज़िन्दगियाँ...\u003cbr\u003eप्रकृतिवाद में शिवमूर्ति जोला के आस-पास दीखते हैं तो पात्रों के जीवन्त चित्रण में गोर्की के समीप।\u003cbr\u003eसंवादों की ध्वन्यात्मकता से वे सतीनाथ भादुड़ी और रेणु की याद दिलाते हैं तो बिम्ब-विधान में जैक\u003cbr\u003eलंडन की। पर इन सबके बावजूद शिवमूर्ति का जो ‘अपना’ है, वह कहीं और नहीं।\u003cbr\u003eलोग हैरान रह जाते हैं यह देखकर कि जब स्वयं जनवादियों की कहानियों से ‘जन’ दिनों-दिन दूर\u003cbr\u003eहोते जा रहे हैं, बिना घोषित जनवादी हुए शिवमूर्ति की कहानियाँ जन के इतने क़रीब कैसे हैं?\u003cbr\u003eशिवमूर्ति के साथ ही हिन्दी कहानी में पुनः कथारस की वापसी हुई है। आज जब कहानी में\u003cbr\u003eपठनीयता के संकट का सवाल उठा हुआ है, शिवमूर्ति इस सवाल का मुकम्मल जवाब हैं।0.\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285676744855,"sku":"9788126728961","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126728961.webp?v=1769284042","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/keshar-kasturi-9788126728961","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}