{"product_id":"khel-khel-mein-9789360867263","title":"Khel-Khel Mein","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ed. and Tr. Nirmal Verma\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eपहले विश्वयुद्ध के बाद जब पूर्वी एशिया के अनेक देश स्वतंत्र होने के बावजूद प्रतिगामी रास्तों पर मुड़ गए, उस समय भी चेकोस्लोवाकिया ने अपनी लोकतांत्रिक और मानववादी मनोभूमि को सुरक्षित बनाए रखा। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग यहूदी विद्वानों, जर्मन लेखकों और रूसी क्रान्तिकारियों की शरण-स्थली बन गई थी। प्राग की अनूठी गरिमा और संवेदनशीलता ने वहाँ बसने वाले जर्मन और यहूदी लेखकों की मनीषा को एक बिरले रंग और लय में ढाला था। निर्मल वर्मा ने अपने युवा वर्ष प्राग में गुज़ारे थे। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज के निमन्त्रण पर वहाँ रहकर न केवल चेक भाषा सीखी, बल्कि तत्कालीन चेक साहित्य से हिन्दी जगत को सीधे परिचित करवाया। उन्हीं की पहल पर चेक साहित्य के मूर्धन्य लेखकों—कारेल चापेक, बोहुमिल हराबाल—के अलावा तब के युवा लेखकों, मिलान कुन्देरा और जोसेफ़ श्कवोरस्की की रचनाएँ हिन्दी में आईं, वह भी उस समय जब यूरोप में भी वे अभी अल्पज्ञात ही थे। यही इस संग्रह की ऐतिहासिक भूमिका है। \u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285696503959,"sku":"9789360867263","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360867263.webp?v=1769284092","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/khel-khel-mein-9789360867263","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}