{"product_id":"krishnavtar-vol-5-satyabhama-9788126706662","title":"Krishnavtar : Vol. 5 : Satyabhama","description":"\u003cp\u003e • Author(s): K. M. Munshi | Tr. Praffulchandra Ojha 'Mukt'\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकृष्ण-चरित की अनेकानेक विलक्षण घटनाओं को ऐतिहासिक और तर्कसंगत ढंग से उद्घाटित और व्याख्यायित करने वाली वृहद् औपन्यासिक कृति ‘कृष्णावतार’ का पाँचवाँ खंड है ‘सत्यभामा’।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e‘सत्यभामा’ के रूप में मुंशी जी ने ऐसी नारी का अंकन किया है जो बचपन से ही स्वयं को कृष्ण-प्रिया मानती है और फिर उनके योग्य ‘वीर-पत्नी’ बनने का संकल्प लेकर भीषण कठिनाइयों में कूद पड़ती है। महत्त्वपूर्ण यह कि ये कठिनाइयाँ उसके धनाढ्य पिता सत्राजित द्वारा खड़ी की गई हैं जो कृष्ण के प्रति घोर शत्रु-भाव रखता है और अपनी अकूत सम्पदा का उपयोग राज्य-हित के विरुद्ध अपने ही वैभव-विलास को बढ़ाने में करता आ रहा है। कृष्ण इसके विरुद्ध हैं। इससे क्षुब्ध सत्राजित स्यमंतक मणि के बहाने कृष्ण के विरुद्ध षड्यंत्र रचता है। सत्यभामा इसे जानती है, इसलिए कृष्ण को बिना बताए उनके मित्र सात्यकि को साथ लेकर उस षड्यंत्र को विफल करने के लिए अन्तहीन जोखिमों से टकराती है और अन्ततः कृष्ण का विश्वास जीत लेने में सफल होती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइस कथा के माध्यम से मुंशी जी ने जहाँ सम्पत्ति के धर्मसम्मत उपभोग की आवश्यकता को रेखांकित किया है, वहीं तत्कालीन वन्य जीवन के बाह्याचारों, लोक-विश्वासों और वातावरण का भी लोमहर्षक चित्रण किया है। निश्चय ही इस ग्रन्थमाला का यह एक और महत्त्वपूर्ण खंड है।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285690933399,"sku":"9788126706662","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126706662.webp?v=1769284077","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/krishnavtar-vol-5-satyabhama-9788126706662","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}