{"product_id":"kuchh-panktiyan-9789360868604","title":"Kuchh Panktiyan","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Gyan Ranjan\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold\"\u003e ‘कुछ पंक्तियाँ’ ‘पहल’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e के सम्पादकीय एवं प्रकाशकीय आलेखों का संकलन है। समसामयिक राजनीति और साहित्य-समाज के प्रतिक्रियावादी तत्वों को लेकर इन आलेखों का जनपक्षधर स्टैंड अपने समय में जितना विचारोत्तेजक, बहस तलब और प्रासंगिक था आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इस सन्दर्भ में ज्ञानरंजन की ये पंक्तियाँ देखी जा सकती है जो उन्होंने पहल-2 के सम्पादकीय में लिखा था।—\u003cbr\u003e\u003cbr\u003e “‘पहल’ का प्रकाशन मुख्य रूप से लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए नहीं बल्कि पाठकों की उस बड़ी संख्या के लिए हुआ है जो एक ख़ास तरह की तैयारी के लिए तैयार होने को है। हम स्पष्ट घोषित करते हैं कि हमारा उद्देश्य क्रांतिकारी चेतना की व्यापक शिक्षा का है।” \u003cbr\u003e\u003cbr\u003e अगस्त 1973 में प्रकाशित अपने पहले अंक से लेकर पूरे पैंतीस साल ‘पहल’ अपनी इस प्रतिज्ञा पर क़ायम ही नहीं रही बल्कि तमाम आलोचनाओं और छिद्रान्वेषण के बावजूद पाठकों के बीच अपनी जगह बढ़ाती रही। और, लघु-पत्रिका आन्दोलन में अपनी वैचारिक धार और दृढ़ता के चलते एक प्रतिमान के रूप में पहचानी गई।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47716894376087,"sku":"9789360868604","price":279.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360868604.webp?v=1776940609","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/kuchh-panktiyan-9789360868604","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}