{"product_id":"lalitaditya-9789352669219","title":"Lalitaditya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Vrindavan Lal Verma\u003cbr\u003e • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजा ने यथाशक्‍त‌ि नम्रता के साथ कहा-' हम कश्मीर नरेश, भारत सम्राट‍् ललितादित्य हैं । तुक्खर देश की ओर जा रहे हैं । 'साधु के मुख पर आश्‍चर्य की एक रेखा तक नहीं खिंची । उसी समता, तटस्थता के साथ बोला-' जानते हो, पूर्वजन्म में क्या थे?'राजा के भीतर विनय की बाढ़-सी आ गई । नम्रता के साथ उत्तर दिया-' मैं नहीं जानता, जान ही नहीं सकता । आप योगी हैं, अवश्य हैं । आप ही बतलाइए ।' साधु ने कुछ क्षण ध्यान लगाने के बाद कहा-' तुम पूर्वजन्म में एक समृद्ध गृहस्थ के नौकर थे, जो खेती कराता था । तुम उसका हल जोतते थे । वह गाँव श्रीनगर से बहुत दूर है जहाँ तुम उस भूमि-स्वामी के खेतों में हल जोतकर अपना जीवन चलाते थे । जिन दिनों तुम हल चलाते, भूमि-स्वामी तुम्हारे लिए खेत पर रोटी औंर पानी भेजता था । एक दिन गरमी की ऋतु में बड़े-बड़े बैलों का भारी हल चलाते-चलाते थक गए । दिन- भर हल चलाया, परंतु न रोटी आई और न पानी मिला । आसपास कहीं भी पानी था ही नहीं । भूख और प्यास के मारे तुम्हारा गला सूख गया । तड़प रहे थे कि थोड़ी- सी दूरी पर रोटी-पानी लानेवाला दिखलाई पड़ा । प्रसन्न हो गए । वह एक मोटी रोटी लाया था और एक छोटा-सा घड़ा पानी का । तुमने खाने के लिए हाथ-मुँह धोया ही था कि कहीं से एक ब्राह्मण हाँफता- हाँफता तुम्हारे पास आकर बोला-' मत खाओ, मैं भूखों मरा जा रहा हूँ ' ।-इसी पुस्तक से\u003c\/p\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46839589077143,"sku":"9789352669219","price":315.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789352669219.webp?v=1769161515","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/lalitaditya-9789352669219","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}