{"product_id":"lohia-ek-pramanik-jivani-9788180314070","title":"Lohia : Ek Pramanik Jivani","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Onkar Sharad\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eडॉ. लोहिया के चालीस साल के राजनीतिक जीवन में कभी उन्हें सही मायने में नहीं समझा गया। जब देश ने उन्हें समझा\u003cstrong\u003e,\u003c\/strong\u003e लोगों की उनके प्रति चाह बढ़ी और उनकी ओर आशा की निगाहों से देखना शुरू किया तो अचानक ही वे चले गए। हाँ\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजाते-जाते अपना महत्त्व लोगों के दिलों में जमा गए।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eलोहिया का महत्त्व\u003cstrong\u003e! \u003c\/strong\u003eउन्हें गए इतना समय बीत गया\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eदेश की राजनीति में कितना परिवर्तन आ गया\u003cstrong\u003e,\u003c\/strong\u003e फिर भी आज नए सिरे से लोहिया की ज़रूरत महसूस की जा रही है। यह तो भावी इतिहास ही सिद्ध करेगा कि देश में आए आज के परिवर्तन में लोहिया की क्या भूमिका रही है। लगता है कि लोहिया ऐसे इतिहास-पुरुष हो गए हैं\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजैसे-जैसे दिन बीतेंगे\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eउनका महत्त्व बढ़ता जाएगा।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकिसी लेखक ने ठीक ही लिखा है—“डॉ. राममनोहर लोहिया गंगा की पावन धारा थे\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजहाँ कोई भी बेहिचक डुबकी लगाकर मन और प्राण को ताज़ा कर सकता है।”\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eएक हद तक यह बड़ी वास्तविक कल्पना है। सचमुच लोहिया जी गंगा की धारा ही थे—सदा वेग से बहते रहे\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eबिना एक क्षण भी रुके\u003cstrong\u003e,\u003c\/strong\u003e ठहरे।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eजब तक गंगा की धारा पहाड़ों में भटकती\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eटकराती रही\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eकिसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eलेकिन जब मैदानी ढाल पर आकर वह तीव्र गति से बहने लगी तो उसकी तरंगों\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eउसके वेग\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eउसके हाहाकार की ओर लोगों ने चकित होकर देखा\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eपर लोगों को मालूम न था कि उसका वेग इतना तीव्र कि समुद्र से मिलने में उसे अधिक समय न लगा। शायद उस वेगवती नदी को ख़ुद भी समुद्र के इतने पास होने का अन्दाज़ा न था।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयह इस देश\u003cstrong\u003e,\u003c\/strong\u003e समाज और आधुनिक राजनीति का दुर्भाग्य है कि वह महान चिन्तक इस संसार से इतनी जल्दी चला गया। यदि लोहिया कुछ वर्ष और ज़िन्दा रहते तो निश्चय ही सामाजिक चरित्र और समाज संगठन में कुछ नए मोड़ आते।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e—ओंकार शरद\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285558517911,"sku":"9788180314070","price":123.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788180314070.webp?v=1769283750","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/lohia-ek-pramanik-jivani-9788180314070","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}