{"product_id":"madhyakaleen-kavita-ka-path-9789362874924","title":"Madhyakaleen Kavita Ka Path","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ed. by Prof. Dr. Tribhuvan Nath Shukla\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमध्यकालीन कवियों को लेकर इधर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं। कुछ एक आधुनिकतावादियों का तो यहाँ तक कहना है कि मध्यकाल अब अप्रासंगिक हो चुका है। ऐसी स्थिति में पाठ्यक्रमों में मध्यकालीन काव्य की स्थिति संदिग्ध करार कर दी जाती है। मगर वस्तुस्थिति इससे एकदम भिन्न है। वैश्विक क्षितिज पर जब हिन्दी कविता के पहचान की बात की जाती है तो मध्यकालीन कविता ही है जो वैश्विक काव्य-चेतना में अपनी पृथक अस्मिता बनाये हुए है। आधुनिक हिन्दी कविता तो वह 'अपनी पहचान' करा पाने में कदापि सक्षम नहीं है। मध्यकालीन कविता का बहुलांश आज भी अपनी खास पहचान बनाये हुए हैं। कारण कि कृतिकार की सामाजिक चेतना कभी बसियाती नहीं।इस रूप में मध्यकाल आज भी हमें चेतना प्रदान करने में सक्षम है। इस संदर्भ में यह कहना अत्युक्ति न होगी कि आज हम चाहे जितने प्रगतिवादी क्यों न बन लें, कितने ही वैज्ञानिक अथवा अत्याधुनिक युग का मानव अपने को क्यों न (आत्मतुष्टि हेतु) कह लें, फिर भी हम मध्ययुग में ही जी रहे हैं। हमारे संस्कार और आदर्श मध्ययुगीन ही हैं। फिर ये मध्ययुगीन आदर्श और संस्कार भले ही पूर्व युग के क्यों न हों, भी हमें दिशाबोध और युगबोध कराने में पूर्ण सक्षम हैं। अस्तु, इन्हें विस्मृत कर देने पर हमें अपनी पहचान करा पाने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हमारे अस्तित्व और अस्मिता पर संदिग्धता की मुहर लग सकती है। ऐसी स्थिति में हमें मध्ययुगीन साहित्य के अन्तर्गत प्राप्त जीवन मूल्यों को बड़ी सजगता के साथ सहजता होगा। हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि हम मध्ययुग के उन जीवन-मूल्यों को भी अपना लें, जो आज अपना मूल्य खो चुके हैं, अपितु उनसे है जो आज भी हमें दीपित करने की ऊष्मा रखते हैं।प्रस्तुत संग्रह प्रामाणिक पाठों के आधार पर तैयार किया गया है। 'मध्यकालीन कविता का पाठ' यदि अध्यताओं के लिये उपयोगी सिद्ध हो सका तो मैं अपना श्रम सार्थक समझंगा ।मेरे प्रत्येक सारस्वत कार्य में सरस्वती की धारा की भाँति जिनकी अनिर्दिष्ट सत्परामर्श संनिहित रहता है ऐसे सामान्य गुरुवर डॉ० महाबीर सरन जैन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मेरे शब्द अट नहीं पाते ।इसकी प्रेस कापी तैयार करने में मेरे विभागीय सहयोगी एवं मित्र डॉ० सत्यनारायण प्रसाद ने जो सहयोग प्रदान किया है उसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ ।— त्रिभुवन नाथ शुक्ल\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523103084695,"sku":"9789362874924","price":200.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789362874924.webp?v=1767180023","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/madhyakaleen-kavita-ka-path-9789362874924","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}