{"product_id":"manushya-hone-ke-sansmaran-9789394902848","title":"Manushya Hone Ke Sansmaran","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Devi Prasad Mishra\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘मनुष्य होने के संस्मरण’­­­­ की नवोन्मुख कथा प्रविधि जिसे देवी प्रसाद मिश्र अन्य कथा कहते हैं भारतीय ही नहीं विश्व साहित्य में आधुनिक फ़ेबल की वस्तु, संरचना और फैंटेसी को पाती दिखती है। यह समकालिक क़िस्सा है—संस्तरवान और तिर्यक। ये बहुत छोटी कहानियाँ हिन्दी की लघु कथा के सरलीकरण से बचकर अपनी ज़ेहनियत पाती रही हैं। खंड-खंड यातनाओं, प्रफुल्लताओं, और प्रतिरोध को अवाँगार्दीय अनुच्छेदों में कहने की अनिवार्यता, दबाव और ज़रूरत से इनकार किया जा सकता है क्या? इन छोटी कहानियों में कथात्मकता के पार जाता और फिर उनकी तरफ़ लौटता एक उड़ाउड़ापन है—कुछ काव्य, कुछ दार्शनिकता, कुछ मेटाफ़िज़िक्स जो काव्याख्यान-सा लगता है। कविता के साथ इन कथाओं के गहरे रिश्तों को झुठलाया नहीं जा सकता। ये कविता हैं तो कथा भी हैं और इसीलिए ये अन्य कथाएँ हैं। इन्हें एक ऐसे छोर से संगठित किया गया है जिसमें कथा कहने की स्वतन्त्रता हो लेकिन अन्तत: ग्रहण करें वे काव्याकार। ये कमतमता का उदाहरण हैं—मिनिमलिज़्म की मिसाल। अन्तर्वस्तु के बिखराव को खुलते हुए शिल्प में कह लेना इनकी उपलब्धि है। यह काव्योन्मुख फ़ेबलीय लोककथात्मक संरचना नयी वस्तु और विन्यास का आश्चर्यसंसार है जो प्रखर रूप से मौलिक और कृतिकारिता का अभूतपूर्व और उच्चतम है।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285692833943,"sku":"9789394902848","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789394902848.webp?v=1769284084","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/manushya-hone-ke-sansmaran-9789394902848","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}