{"product_id":"matrichhabi-9788180319648","title":"Matrichhabi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Mahashweta Devi\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: LokBharti Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Ancient, Classical \u0026amp; Medieval\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘माँ’ सिर्फ़ एक सम्बन्धवाचक शब्द नहीं, बल्कि बरगद की वृक्ष की तरह इसकी विशालता है। जिसकी असंख्य जड़ें हैं, जो ज़मीन में मज़बूती से पैठकर अपने हर छोटे तने को पेड़ बनते देखती है। महाश्वेता देवी की ‘मातृछवि’ में माँ रूपी बरगद के अनेक तने हैं जिनमें उसके भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देते हैं। इसमें कौशल्या है जो अपनी ज़मीन के लिए, अपने अधिकार के लिए हसुआ लेकर अकेले पूरे गाँव का नेतृत्व करती है और अपनी ज़िन्दगी न्योछावर कर देती है। वहीं जाह्नवी माँ हैं, जिन्हें जीते-जी देवी अवतार का रूप बताकर उनके पोते उनकी कमाई खाते रहते हैं और असल में उन्हें एक कोठी में बन्द कर खाने के लिए भी तरसाते हैं। ‘मातृछवि’ सिर्फ़ माँ के भिन्न रूपों को नहीं गढ़ती, बल्कि आज़ादी के बाद के बंगाल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परतों को भी उधेड़ती है। परतों के खुलते ही जहाँ नक्सलबाड़ी आन्दोलन की रक्तरंजित भूमि दिखाई देती है तो वहीं समाजवाद के निर्माण के नाम पर यमुनावती की माँ और उसके जैसे तमाम लोग, जो अपने को फालतू और अनावश्यक समझने पर मजबूर किए जाते हैं। वहीं अपनी इज़्ज़त को बचाए रखने और अपने बच्चे को भरपेट चावल खिलाने के लिए जटी को सुबह-शाम की माँ बनना पड़ता है। और दिन देवी बनकर गुज़ारना पड़ता है। महाश्वेता देवी की कहानियों में भले ही औरत का मातृ रूप आज से पचास साल पहले का ही क्यों न हो, लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी तब रही होगी।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":48265320890519,"sku":"9788180319648","price":210.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788180319648.webp?v=1789380040","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/matrichhabi-9788180319648","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}