{"product_id":"matsyagandha-9789350727362","title":"Matsyagandha","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Narendra Kohli\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Religious - General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसत्यवती के मुँह से जैसे अनायास ही निकल गया, ''मैं निषाद-कन्या ही हूँ तपस्वी ! मत्स्यगन्धा हूँ मैं । मेरे शरीर से मत्स्य की गन्ध आती है ।\" तपस्वी खुल कर हँस पड़ा और उसने जैसे स्वत:चालित ढंग से सत्यवती की बाँह पकड़ कर उसे उठाया, \"मछलियों के बीच रह कर, मत्स्यगन्धा हो गई हो पर हो तुम काम-ध्वज की मीन ! मेरे साथ आओ। इस कमल-वन में विहार करो और तुम पद्म-गन्धा हो जाओगी।\" दोनों द्वीप पर आये और बिना किसी योजना के अनायास ही एक-दूसरे की इच्छाओं को समझते चले गये\/ तपस्वी इस समय तनिक भी आत्मलीन नहीं था । उसका रोम-रोम सत्यवती की ओर उन्मुख ही नहीं था, लोलुप याचक के समान एकाग्र हुआ उसकी ओर निहार रहा था । सत्यवती को लग रहा था, जैसे वह मत्स्यगन्धा नहीं, मत्स्य-कन्या है । यह सरोवर ही उसका आवास है । चारों ओर खिले कमल उसके सहचर हैं । पृष्ठ संख्या 21 से \" सत्यवती को विश्वास नहीं हुआ था । पिता के दूसरे विवाह से देवव्रत को ऐसा कौन-सा लाभ होने जा रहा था, जिसके लिए देवव्रत ने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी ? यह प्रतिज्ञा पिता को प्रसन्न करने के लिए ही तो की थी न । पर, पिता को प्रसन्न करके क्या मिलेगा देवव्रत को- राज्य ही तो ? पर वही राज्य त्यागने की प्रतिज्ञा का ली है उन्होंने । केवल राज्य ही नहीं- स्त्री-सुख भी । क्यों की यह प्रतिज्ञा ? इससे देवव्रत को कौन-सा सुख मिलेगा ?\"\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46523078836375,"sku":"9789350727362","price":132.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789350727362.webp?v=1767179880","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/matsyagandha-9789350727362","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}