{"product_id":"morcha-dar-morcha-9789352292240","title":"Morcha Dar Morcha","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Kiran Bedi\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Communication Studies\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eमोर्चा दर मोर्चा - “किसी भी इन्सान की अपनी योजनाओं और कार्य प्रणाली में विश्वास की परख उस समय होती है जब उसके सामने फैला क्षितिज सम्पूर्ण रूप से अन्धकारमय हो जाता है।\" ऐसा मत था महात्मा गाँधी का इस कठिनाई को डॉ. किरण बेदी ने अनेक बार झेला है। हर बार वह अन्धकार को चीर कर इस पार आ पहुँची हैं। अपनी बात की सुनवाई के लिए किरण ने सिर्फ़ अपना ख़ून-पसीना नहीं बहाया, और भी बहुत कुछ किया है जिसे आप मोर्चा-दर-मोर्चा में पढ़ेंगे, पायेंगे, महसूस करेंगे। वह कहती हैं, \"अगर कोई मुझे दीवार के ऊपरी सिरे तक भी धकेल दे तो भी मैं अपना काम जारी रखते हुए कोई न कोई दरार उस ठंडी कठोर दीवार में ढूँढ़कर समस्या का हल ढूँढ़ लूँगी।मोर्चा-दर-मोर्चा में मिलिए एक बुततराश से। अगर किरण एक बुततराश न होतीं तो 22 अक्तूबर, 1997 को जोज़फ बोएज़ संस्थान उन्हें सामाजिक मूर्तिकार घोषित करते हुए 14,000 डालर के पुरस्कार से सम्मानित न करता स्वयं एक प्रसिद्ध कलाकार जोज़फ बोएज़ मानते थे कि एक सामाजिक बुत तभी तराशा जा सकता है जब हर व्यक्ति अपनी क्षमता का पालन पोषण करते हुए एक कलात्मक तरीक़े से उसे सँजोए रखता है। तिहाड़ कारा में किरण ने यही तो किया, एक ग़ैर-पारम्परिक ढंग से सृजन पर अपनी पैनी निगाहें टिका कर जाने-अनजाने ही सही, जोज़फ बोएज़ की इस मान्यता को एक सार्थक रूप दे दिया। सृजनात्मकता और मान-मर्यादा को किरण ने ऐसे इन्सानों के भीतर संचारित कर दिया जो निराशा, उदासी और विषाद की प्रतिमूर्तियाँ बन चुके थे। बोएज़ की सोच से बहुत मेल खाता है किरण का मानवता के प्रति प्रेम। तभी तो जब वह जर्मनी स्थित हैसेन के छः कारावासों में गयी तो वहाँ एक ऐसी लौ प्रज्वलित कर के आयी जिसकी रोशनी तले जो भी होगा अच्छा ही होगा। आज और कल दोनों ही किरण के हैं।किरण की अपनी एक अलग विशेष शैली है-बोलने और लिखने की। उनके सबसे अधिक प्रिय शब्द हैं : कर्तव्य, मानवता, आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, परिश्रम, विद्या साधारणता, चरित्र, अनुशासन, सकारात्मकता, प्रार्थना, सर्वधर्म, खुशी, निःस्वार्थ आदान-प्रदान, सुस्पष्टता, संयम, सन्तुलन, सहजता, और इन सबसे ऊपर समस्या निवारण।और किरण को सबसे अधिक अप्रिय लगनेवाले शब्द हैं - ऊपर उद्धृत शब्दों के सभी विपरीत लफ्ज़।एक चातुल घाटी में बिना कोई बवंडर चक्रवात उठाये सिर्फ़ अपनी वाणी की मधुरता से किरण लहू की प्रतिष्ठा कैसे बनाये रखती हैं? और अँधेरे रास्तों में भटकते मौत के बहुत पास पहुँच चुके लोगों को वह बंजर ज़मीन और कब्रों से बाहर लाकर फूलों की लहलहाती खिलती फसलों की सम्भावनाओं के बीच कैसे खड़ा कर देती हैं? उनकी विशिष्टता ही है। सवाल कोई भी हो उसका हल ढूँढ़ निकालना किरण का प्राकृतिक स्वभाव है। जनवरी माह में जब वह गाँधी जी की जन्म स्थली पोरबन्दर गयीं तो उन्होंने पूरे वातावरण को एक बेचैन करनेवाली दुर्गन्ध में लिपटा हुआ पाया। पता चला कि मछेरे मछली सुखाने के लिए वहाँ उपलब्ध भगवान की अद्भुत देन ताजी हवा में मछली सुखाते हैं। किरण ने दिल्ली लौट कर 17 जनवरी, 1998 को सर्वोच्च न्यायालय में एक व्यक्तिगत पत्र लिख कर अहिंसा के पुजारी के घर और आम आदमी की दुर्गति पर ध्यान केन्द्रित करवाया कि लोगों के हिस्से की हवा को इस तरह दूषित करने के स्थान पर आज अनेक अन्य आधुनिक तरीकों से मछली सुखाने के तरीके उपलब्ध हैं। ज़रूरी नहीं कि मसला बहुत विशाल या विकराल ही हो। गोवा कारा में बन्द कैदी नम्बर 787, सुशील को, उसके साहित्य प्रेम को लेकर उत्पीड़ित करनेवाले अधिकारी को पत्र लिख कर किरण ने ही सुनिश्चित किया है कि लेखकों, सम्पादकों द्वारा भेजी पुस्तकें कैदी तक पहुँचें। या फिर गोवा में ही बन्द दो हिमाचली बन्दियों का तबादला हिमाचल की नाहन जेल में करवाने में पूरा सहयोग दिया।तिहाड़ में बिताये समय को वह 22 वर्ष के अपने कार्यकाल का सर्वयोग मानती हैं। कैसे-कैसे कठोर, जटिल सुखद-दुखद अनुभवों की एक लड़ी थे वह 22 वर्ष। जिस तरह का प्रबन्ध-कौशल किरण ने दिल्ली के यातायात को व्यवस्थित करने में दिखाया उससे कहीं ऊपर रहा तिहाड़ कारा में सामूहिक सहभागिता से ओत-प्रोत नेतृत्व। तिहाड़ का अनुभव इसीलिए इतने स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से उभरा क्योंकि उस समय की हालत बद से बदतर हो चुकी थी- विशेष रूप से विदेशी बन्दियों के कारण ऐसी स्थिति बनी हुई थी। वह एक ऐसी अवस्था थी जिसे किरण के 22 वर्षों के अनुभव की ज़रूरत थी।3 मई, 1993 को वृक्षारोपण उत्सव के दौरान बन्दी नूर मुहम्मद ने कहा था, \"मैडम आप ही बनेंगी भारत की प्रधानमन्त्री तभी होगा इस देश का उद्धार\" भाजपा ने '98 के चुनावों के लिए किरण को टिकट देने का आग्रह किया तो है लेकिन उन्होंने उसे स्वीकारा नहीं। \"राजनीति में मैं उस दिन जाऊँगी जब अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाऊँगी।\" आज के बिगड़े हालात से भी वह विचलित नहीं हैं। वह कहती हैं, \"आख़िर हमारे लिए वरणाधिकार तो है, विकल्प मौजूद हैं, श्रेष्ठतम व्यक्ति को अपना मत देने का हक तो है। अभी निराश होने की ज़रूरत नहीं है।\" -सरोज वशिष्ठ\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523067105431,"sku":"9789352292240","price":98.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789352292240.webp?v=1767179799","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/morcha-dar-morcha-9789352292240","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}