{"product_id":"nadi-ghar-9789390971718","title":"Nadi Ghar","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Krishna Kishore\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eयह जीवन के साथ एक सहयात्री की तरह चलती जीवन जैसी ही लम्बी कविता है। किसी बड़ी भीतरी या बाहरी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रिया से उपजी हुई नहीं, बल्कि जीवन के रोजमर्रा के साथ बतियाती हुई कविता।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eलेकिन जीवन से आक्रांत कविता नहीं, न ही उसके हर ओर फैले विराट वैभव से भयभीत। एक धीमी बतकही की तरह यह अपनी आँख से अपने आसपास के संसार को, व्यक्ति को, उसके इर्द-गिर्द बुने गुए रिश्तों के संजाल को, भीड़ को, भीड़ के बीच भटकती व्यर्थता को देखती हुई, और इन सबके बारे में कुछ कहती-सुझाती-बताती हुई।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e'प्रार्थनारत ज़िन्दगी मुझे क्रोधित नहीं करती। क्योंकि मैं जानता हूँ। ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं। बस वही इन्हें नहीं मिलना है।' कवि इस कविता में जैसे संसार के बीच अपने होने का ऋण चुकता करते हुए अनेक चीजों की तरफ इशारा करता है। प्रकृति में निहित आखिरी उम्मीद को भी हमारे ध्यान में लाता है और हमारे समाज के भीतर की नकारात्मकता को भी जिसके चलते कई बार हमारा पल-पल व्यथा का बिम्ब होकर रह जाता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकवि इस कविता के बारे में अपनी बात रखते हुए कहता है कि नदी घर एक ऐसी यात्रा पर निकलने का प्रयास है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गए हैं और हमारा अपना वजूद एक बोझ\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285665341591,"sku":"9789390971718","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789390971718.webp?v=1769284029","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/nadi-ghar-9789390971718","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}