{"product_id":"nithalle-bahut-busy-hain-9789360862428","title":"Nithalle Bahut Busy Hain","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Sampat Saral\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eलोभ-लाभ के गणित में उलझे लोगों के बीच सच को बयान करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहाँ सच लोगों के सामने किसी आईने की तरह खड़ा हो जाता है और उन्हें उनकी असल शक्ल दिखाने लगता है। लेकिन एक सजग रचनाकार यही काम करता है। उसके लिए अपने समय की सचाइयों से मुँह मोड़ पाना न तो सम्भव है न उचित। दरअसल एक रचनाकार के रूप में उसकी सफलता ही इससे तय होती है कि वह सच के साथ खड़ा है कि नहीं। जाहिर है व्यक्तिगत दायरों में महदूद, खौफ़ खाए अधिकतर लोगों के विपरीत उसे निडर होना पड़ता है। तभी उसका लिखा हलचल पैदा करता है। सुपरिचित व्यंग्यकार सम्पत सरल की इस किताब से गुज़रते हुए आप इस सचाई से इनकार नहीं कर पाएँगे। वे एक सजग रचनाकार की इस भूमिका को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। आम बोलचाल की भाषा और भंगिमाओं से अपने इस समय पर सीधा प्रहार करते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में विजय बहादुर सिंह ने ठीक ही कहा है—यह कला उनसे पहले हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों में थी पर मंचों पर जाकर अपने पाठकों को श्रोताओं के रूप में सामने बिठाकर आँखों में आँखें डालकर कहने की कला का आविष्कार तो शरद जोशी का है। सम्पत सरल इसी कला के आगे के अध्याय हैं। \u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285673631895,"sku":"9789360862428","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360862428.webp?v=1767668616","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/nithalle-bahut-busy-hain-9789360862428","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}