{"product_id":"pakka-mahaal-9788181431189","title":"Pakka Mahaal","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ajay Mishra\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eआप ही तय करें कि बनारस और बनारसी जीवन पर आप जो पढ़ने जा रहे हैं, वह उपन्यास है या मुहल्ला स्तर की कहानियों, गलियों में फैली दंत कथाओं और पान दुकानों के गलचौर का एक ऐसाअनगढ़ संकलन, जिसमें गलियां तो हैं पर गालियां नहीं, जिनसे कई लेखकों ने बनारस की पहचान खड़ी की है। आपने उपन्यास माना तो सौभाग्य। क्योंकि न इसमें नायक है न नायिका । मुझ सरीखेअरसिक को गलियां मुग्धा, स्वकीया, परकीया नायिका बन लुभाती रही हैं। मैंने बनारस को महानायक के रूप में देखा और जाना है ।बनारस को पकड़ने का मेरा सारा कल, बल और छल विफल हो गया जब मैंने पाया कि यह शहर हर बार हाथों से फिसल जाता है। अंततः, इसे छूने मात्र से संतोष कर रहा हूं। शीघ्र ही बनारसके प्राचीनतम निवासियों-पंडों, घाटियों, नापितों, मल्लाहों और डोमराजा को समेटते हुए फिर कोशिश करूंगा इसे पकड़ने की – यह जानते हुए कि बनारस पर दर्जनों उपन्यास लिखे जायं तब भी मात्रइसकी अंगुली ही पकड़ी जा सकेगी। मैं बनारस पर अपनी उपन्यास त्रयी का समापन काशी के पंडितों पर करूंगा। घाटकिनारे की संस्कृति और समाज, जहाँ बनारस आज भी जिंदा है, को पंडों, घाटियों, मल्लाहों, नापितों, डोम और पंडित परम्परा को जाने बिना नहीं समझा जा सकता। यही तो बनारस है ।उपन्यास सरीखी रोचकता न हो, कहानी जैसी कहानी न हो, कथ्य में रवानी न हो और गद्य का अंग भंग हो तो इन दोषों का ठीकरा निःसंकोच मेरे ही सिर फोड़ें। यदि पसंद आये तो प्रकाशकको साधुवाद दें जिसने कछाड़ा बांध पुस्तक छोप कर छापी और आप तक पहुंचाई।अजय मिश्र\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523149746327,"sku":"9788181431189","price":387.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788181431189.webp?v=1767180285","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/pakka-mahaal-9788181431189","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}