{"product_id":"patthar-aur-parchhaiyan-9788180317675","title":"Patthar Aur Parchhaiyan","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Markande | Ed. Girish Rastogi\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eइस एकांकी-संग्रह में आठ एकांकी हैं जिनके द्वारा मार्कण्डेय की आन्तरिक और बाह्य दोनों द्वन्द्वों और चिन्ताओं को समझा जा सकता है\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e इन एकांकियों में भी कहानियों की तरह सामाजिक पृष्ठभूमि में हमारा आज का जीवन और समस्याएँ हैं\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e बड़ी विशेषता यह है कि वह नाटक—बल्कि एकांकी-जैसी विधा को गाँव की ओर ले जाते हैं\u003cstrong\u003e!\u003c\/strong\u003e क्योंकि मार्कण्डेय यह महसूस करते थे कि ग्रामीण जीवन-सन्दर्भों में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी या नहीं के बराबर ही रही है, इसलिए ग्राम-चेतना अपने प्राचीन अवदानों से चिपकी है\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e उसने अनेक कारणों से वाचिक पद्धति द्वारा ही अपनी संस्कृति को अपनी आगामी पीढ़ी तक सम्प्रेषित किया है\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eएकांकी को गाँव की ओर ले जाने से उनके सामने चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं—विषय की, नाट्य-शिल्प की, भाषा की, रंग-शैली की, पात्र, कथानक सबकी\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e आज जो सवाल उठे हुए हैं—गाँव के, जनता के, आम आदमी और जनचेतना के, क्या ये एकांकी उन सवालों को पूरा कर पाएँगे? लोकभाषा, लोकनाटक, लोकमंत्र, नुक्कड़ नाटक जैसी स्थितियों से भी वह गुज़रना चाहते हैं हालाँकि वह हिन्दी रंगमंच की स्थिति को भी अच्छी तरह समझ ही रहे थे\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e1956 में पहली बार प्रकाशित ‘पत्थर और परछाइयाँ’ पुस्तक में छह एकांकी ‘डंका बुआ’ और ‘रसोईघर’ जोड़े गए हैं। उम्मीद है कि पाठकों के ऊपर यह एकांकी-संग्रह अलग अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली के साथ छाप छोड़ने में सफल होगा\u003cstrong\u003e।\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285543575703,"sku":"9788180317675","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788180317675.webp?v=1769283723","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/patthar-aur-parchhaiyan-9788180317675","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}