{"product_id":"pratinidhi-kavitayein-kailash-vajpeyi-9789360864286","title":"Pratinidhi Kavitayein : Kailash Vajpeyi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Kailash Vajpeyi | Ed. Om Nishchal\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकैलाश वाजपेयी सभ्यता के ध्वंस, मानवीयता के लोप, बंजर होते संवेदन और संताप से झुलसते आँसुओं पर विक्षोभ प्रकट करने वाले, कविता के एक ऐसे नागरिक रहे हैं, जिनकी आवाज़ इतनी वेधक, प्रखर और सत्वग्राही है कि वह अपने अनहद से निष्करुण होती पृथ्वी तक को कँपा दे। कविता का यह तात्त्विक-सात्विक स्वर कैलाश वाजपेयी के पहले संग्रह ‘संक्रान्त’ से लेकर ‘हंस अकेला’ तक में समाया हुआ है। उनका काव्य संसार सामान्य जीवन से लेकर वैश्विक सन्दर्भों और मिथकों की अन्तर्वस्तु से सम्पुष्ट है। वह विश्व वैचारिकी की उनकी विपुल यायावरी से निस्सृत कवि विवेक और जीवन विवेक से संवलित है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eभूमंडलीकरण और बाजारवाद के पसरते प्रभुत्व ने सदियों की हमारी सांस्कृतिक विरासत की चूलें हिला दी हैं। हमारी संवेदना को जड़ बनाते पूँजी के प्रेतों ने जिस तरह हमारे इर्द-गिर्द प्रलोभनों का जाल बिछा दिया है, उसके परिणाम निश्चय ही शुभंकर नहीं हैं। कैलाश वाजपेयी का काव्य-संसार कवि के कारुण्य, विक्षोभ और उसकी कबीरी फटकार की साखी बन गया है। भारतीय समाज, वैश्विक यथार्थ और सभ्यता के ज्वलन्त प्रश्नों से लैस कैलाश वाजपेयी की ये कविताएँ उनके काव्य का एक प्रातिनिधिक चयन हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e—ओम निश्चल\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285645189271,"sku":"9789360864286","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360864286.webp?v=1769283960","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/pratinidhi-kavitayein-kailash-vajpeyi-9789360864286","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}