{"product_id":"prem-lahari-9789387462618","title":"Prem Lahari","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Trilok Nath Pandey\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e'प्रेमलहरी' इतिहास के बड़े चौखटे में कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से बुनी हुई प्रेमकथा है। यह इतिहास नहीं है, न ही इसका वर्णन किसी इतिहास पुस्तक में मिलता है। लेकिन जनश्रुति में इस कथा के अलग-अलग हिस्से या अलग-अलग संस्करण अकसर सुने जाते हैं। इस प्रेम-आख्यान के नायक-नायिका हैं शाहजहाँ के राजकवि और दारा शिकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ और मुग़ल शाहज़ादी गौहरआरा उर्फ़ लवंगी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eमध्यकालीन इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम-आख्यान तो कई मिलते हैं, लेकिन किसी शाहज़ादी की किसी ब्राह्मण आचार्य और कवि से यह अकेली प्रेम कहानी है जो मुग़ल दरबार की दुरभिसन्धियों के बीच आकार लेती है। 'गंगालहरी' ख़ुद पंडितराज जगन्नाथ का अद्भुत संस्कृत काव्य है जिसमें कहीं-कहीं ख़ुद उनके प्रेम की व्यंजना निहित है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रचलित बतकहियों की गप्प समाजविज्ञान से मिल जाए तो उससे एक बड़ा सच भी सामने आ जाता है। इस उपन्यास में यह हुआ है। मुग़ल शाहज़ादियों को न शादी की इजाज़त थी न प्रेम करने की। ऐसे में चोरी-छुपे प्रेम-सुख तलाश करना उनकी मजबूरी रही होगी। इस उपन्यास में ऐसे कुछ विवरण आए हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयह उपन्यास इतिहास की एक फ़ैंटेसी है, जिसमें किंवदन्तियों के आधार पर मध्यकालीन सत्ता-संरचना के बीच दो धर्मों और दो वर्गों के बीच न पाटी जा सकनेवाली ख़ाली जगह में प्रेम का फूल खिलते दिखाया गया है।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285681496215,"sku":"9789387462618","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789387462618.webp?v=1769284057","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/prem-lahari-9789387462618","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}