{"product_id":"premasharam-9788192434643","title":"Premasharam","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Premchand\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘प्रेमाश्रम’ प्रेमचन्‍द का सर्वप्रथम उपन्यास है\u003cstrong\u003e,\u003c\/strong\u003e जिसमें उन्होंने नागरिक जीवन और ग्रामीण जीवन का सम्पर्क स्थापित किया है और परिवार के सीमित क्षेत्र से बाहर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण करते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eभारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की प्रथम झाँकी और भावनागत रामराज्य की स्थापना का स्वप्न ‘प्रेमाश्रम’ की अपनी विशेषता है। इसका उद्देश्य है—‘साम्य सिद्धान्त\u003cstrong\u003e’\u003c\/strong\u003e। \u003cstrong\u003e‘\u003c\/strong\u003eप्रेमाश्रम\u003cstrong\u003e’\u003c\/strong\u003e में जीवन-मरण के गूढ़\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eजटिल प्रश्नों की मीमांसा है। सभी लोग पक्षपात और अहंकार से मुक्त हैं। आश्रम सारल्य\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eसन्तोष और सुविचार की तपोभूमि है। यहाँ न ईर्ष्या का सन्ताप है न लोभ और उन्माद\u003cstrong\u003e, \u003c\/strong\u003eन तृष्णा का प्रकोप। यहाँ न धन की पूजा होती है और न दीनता पैरों-तले कुचली जाती है। आश्रम में सब एक-दूसरे के मित्र और हितैषी हैं। मानव-कल्याण ही सभी का चरम लक्ष्य है। इस बात का व्यावहारिक रूप हमें उपन्यास के ‘उपसंहार’ शीर्षक अंश में मिलता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285688836247,"sku":"9788192434643","price":209.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788192434643.webp?v=1769284073","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/premasharam-9788192434643","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}