{"product_id":"premyog-premyog-9788121260657","title":"प्रेमयोग (Premyog)","description":"\u003cp\u003e • Author(s): स्वामी विवेकानन्द (Swami Vivekananda)\u003cbr\u003e • Publisher: Gyan Publishing House\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Gyan Publishing House\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकिताब के बारे में प्रेम योग यानि भक्ति, जिस प्रकार सांसारिक वस्तुओ में हमारी घोर आसक्ति (प्रीति) होती है। वैसी ही प्रबल आसक्ति, दृढ़ संकल्प, प्रीति यानी प्रेम हमारी जब प्रभु के प्रति होती है तब वह भक्ति कहलाती है। उस प्रेम रूपी भक्ति को प्राप्त करने में हमें सर्वप्रथम साधना की आवश्यकता होती है। साधना की प्राप्ति हमें विवेक, शुद्ध आहार अभ्यास क्रिया यानी दूसरांे की भलाई, स्वाध्याय, देवयज्ञ पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ, दान, दया अहिंसा आदि से प्राप्त होती है भक्ति की प्रथम सीढ़ी है, प्रभु के प्रति अनुराग। दूसरा सोपान है गुरु या आचार्य जिस आत्मा से यह शक्ति मिलती है वह है गुरू, और जिस आत्मा को यह शक्ति मिलती है वह है शिष्य। प्रेम यानि भक्ति के लिये हमंे किसी प्रतिमा की आवश्यकता नहीं होती प्रतिमा यानि प्रतीक, इष्ट यानी हमारे चुने हुए देवता, वही हमारी मुक्ति या मोक्ष का साधन बनते है। भक्ति भी दो प्रकार की होती है पूर्व भक्ति और परा भक्ति। भक्त के जीवन के निर्माण के लिए भक्ति की सत्य भावना का आत्म सम्मान करने हेतु तथा भक्त के जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये प्रेमयोग यानि प्रीति आवश्यक है। निष्कर्ष हैप्रेम, प्रेमी और प्रेम पात्र याने भक्ति भक्त और भगवान तीनों एक हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Gyan Publishing House","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46194870091927,"sku":"9788121260657","price":112.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788121260657.webp?v=1769299248","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/premyog-premyog-9788121260657","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}