{"product_id":"purkhon-kii-siikh-purkho-ki-seekh-9789356630581","title":"पुरखों की सीख (Purkho Ki Seekh)","description":"\u003cp\u003e • Author(s): जगराम सिंह (Jagram Singh)\u003cbr\u003e • Publisher: GenNext Publication\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: GenNext Publication\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकिताब के बारे में: कोई भी राष्ट्र तभी राष्ट्र बनता है जब उसकी आधार-शिला भूमि, जन और उसकी संस्कृति पर अवस्थित होती है भूमि और जन तो समझ में आते हैं परन्तु संस्कृति को सहज एवं सरल ढंग से समझ पाना थोडा कठिन होता है यह जो संस्कृति होती है पूर्व में जो जन शब्द आया है उसके कठोर अनवरत प्रयासों की फलश्रुति होती है । यह फलश्रुति बड़े ही यत्न अर्थात निरंतर रगड़ से आती है कहा गया है कि ‘‘अतिसय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रगट चन्दन से होई’’ इसका मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति प्रयास दर प्रयास करता है परिणामतः जो पगडंडी बनती है अर्थात ‘‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात नित सिल पर परत निशान’’ आखिर इस सतत प्रक्रिया से जो अमृत निकलता है उसे ही संस्कृति कहते हैं यही वह अमृत यथाभाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन, भ्रमण आदि रूप में सनातन काल से मन्त्र स्वरुप जो पूर्वजों से प्राप्त होता आया है इसी अमृत तत्व को ‘‘पुरखों की सीख’’, रुपी पुष्प हार में पिरोकर केवल सेवक ने अपनी राष्ट्र भक्ति की भावना को जन जन के श्री चरणों तक पहुँचने का कार्य किया है। अवश्य ही पुष्प को समस्त राष्ट्र भक्तों का शुभाशीष प्राप्त होगा। इसी विनम्रांजलि के साथ धन्यवाद, जगराम सिंह\u003c\/p\u003e","brand":"GenNext Publication","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46195181912215,"sku":"9789356630581","price":126.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789356630581.webp?v=1769300035","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/purkhon-kii-siikh-purkho-ki-seekh-9789356630581","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}