{"product_id":"raavi-paar-9789390625208","title":"Raavi Paar","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Balwant Singh\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eरावी नदी से करीब दो मील पूर्व की ओर एक गाँव है जिसे चब्बा कहते हैं। चब्बा अपने ऊँचे-लम्बे जवानों के लिए अपने इलाके में दूर-दूर तक मशहूर था। हर लड़का जब सोलह-सत्रह साल की उम्र तक पहुँचता तो बड़े लोग उसके हाथ-पाँव निकलने से अन्दाज़ा लगाने लगते कि वह कैसा करारा जवान होगा। जिस लड़के से कुछ भी आशा बँध जाती , उसे हर ओर से खूब प्रोत्साहन मिलता। \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउन दिनों बागड़सिंह नया-नया जवान हुआ था। जवानी की मस्ती तो वैसे भी मशहूर है, लेकिन बागड़सिंह के दिमाग़ में यह मस्ती बिलकुल खरमस्ती का रूप धारण कर गयी थी। \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकाबलासिंह साढ़े छह फुट से भी ऊँचा था और उसे पौने छह फुट से कम बागड़सिंह बिलकुल मच्छर-सा दिखायी दिया। यह माना कि बागड़सिंह काबलासिंह के मुक़ाबले में कुछ नहीं था, लेकिन इसमें भी कोई सन्देह नहीं था कि उसके बदन में भी बिजली कूट-कूटकर भरी हुई थी। \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसारे जवान काबलासिंह को देखकर एक ओर हट गये और काबलासिंह की नज़रें अब भी उस घुड़सवार पर जमी हुई थीं- सुजानसिंह ने घोड़ा दौड़ाया नहीं- वह पहले की तरह सहज से आगे बढ़ता चला गया... काबलासिंह ज्यों-का-त्यों दरवाजे पर हाथ रखे खड़ा था... और बागड़सिंह पीछे खड़ा मालिक की गुद्दी पर लहलहाते हुए लाल पीले और सफ़ेद नन्हें-नन्हें बालों को देख रहा था... \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e“बागेड़या!” \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसुनकर बागड़सिंह का कलेजा धक-धक करने लगा... अपने शरीर की पूरी शक्ति लगाकर उसके मुँह से बड़ी ही भरी हुई आवाज़ निकली “जी।\" \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइसी से सुरजीत का रिश्ता कर देने के लिए कह रहा था?\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eमालिक की यह आवाज़ सुनकर बागड़सिंह सुन्न हो गया...उसे भागने का कोई रास्ता दिखायी नहीं दे रहा था...अबकी उसके मुँह से भरी हुई आवाज तक न निकल सकी। \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअपनी बात का उत्तर न पाकर मालिक ने घूमकर उसकी ओर देखा... बागड़सिंह ने डरते-डरते अपनी पलकें ऊपर उठायीं\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउसने देखा कि काबलासिंह की घनी मूंछों तले उसके मोटे होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान चन्द्रमा की पहली किरण की तरह जन्म ले रही थी।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285547835543,"sku":"9789390625208","price":210.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789390625208.webp?v=1767668596","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/raavi-paar-9789390625208","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}